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भीमराव अंबेडकर ने दिखाई भारत को नई राह

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क

Updated Thu, 06 Dec 2012 11:13 AM IST
bhim rao ambedkar showed new path to india
भारत के संविधान निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की आज (6 दिसंबर) पुण्यतिथि है। भारत रत्न से सम्मानित इस हस्ती ने देश को राजनीतिक और सामाजिक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के मऊ में जन्मे अंबेडकर एक राजनीतिक नेता, कानूनविद, दार्शनिक, इतिहासकार, अर्थशास्‍त्री, शिक्षक और संपादक थे। प्यार से उनके अनुयायी उन्हें बाबासाहेब कहते थे।

भीमराव, रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई मुरबादकर की 14वीं और अंतिम संतान थे। वे हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे जो अछूत माना जाता था। अंबेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना से जुड़े रहे। उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल मऊ छावनी में काम करते थे और बाद में सूबेदार बने।

प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद अंबेडकर ने 1908 में एलफिंस्टन कॉलेज में प्रवेश लिया। बाद में वे बडौदा के गायकवाड़ शासक सहयाजी राव के वजीफे पर उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका गए। राजनीतिक और अर्थशास्‍त्र में उच्च डिग्री हासिल करने के बाद स्वदेश लौटने पर उन्होंने बडौदा सरकार में नौकरी की। नौकरी के दौरान उन्हें अछूत होने का कड़वा अनुभव हासिल हुआ।

हालाकि उस समय देश में ब्रिटिशों को बाहर करने के लिए आंदोलन अपने जोरों पर था। एक ओर महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसक आंदोलन से अंग्रेज सरकार सहम गई थी। वहीं चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, खुदीराम बोस जैसे क्रांतिकारियों ने अंग्रेज सरकार के नाकों में दम कर रखा था।

1936 में अंबेडकर ने 'इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी' नामक राजनीतिक दल का गठन कर सियासी धरातल पर कदम रखा। समाज में अछूतों के प्रति असहिष्‍णु व्यवहार खत्म करने के लिए उन्होंने 'बहिष्कृत भारत' नामक पत्रिका का संपादन किया। जब 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तो संविधान के मसौदे को अंतिम रूप देने में अंबेडकर की अहम भूमिका रही। उन्हें देश का प्रथम कानून मंत्री होने का श्रेय प्राप्त है।

1950 के दशक में अंबेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए। इसी दशक में करीब पांच लाख समर्थकों के साथ अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। 6 दिसंबर 1956 को नई दिल्ली में इस महान हस्ती का निधन हो गया।
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