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बेटियों के हौसले देख आमिर भी रह गए दंग

तबस्सुम/अमर उजाला, वाराणसी।

Updated Thu, 23 Jan 2014 01:37 PM IST
beti hi bachayegi varanasi
वक्त और हालात से बेपरवाह एक कोशिश, एक जुनून...। सिर्फ लक्ष्य पर नजर। बिना थके, बिना रुके। हौसले का हाथ थामे सफर आगे बढ़ा तो मुश्किलें भी आईं लेकिन उन्हें अपनी मेहनत पर भरोसा था। आखिरकार संघर्ष रंग लाया।
17 साल से बंद पड़े मदरसे का न सिर्फ ताला टूटा बल्कि वहां की खामोशी भी टूटी। अब तो पूरे गांव की जैसे तालीम से दोस्ती हो चली है। दीनी तालीम हासिल कर घर में चूल्हा-चौका करने वाली बेटियों का नाता भी पढ़ाई से जुड़ गया है।

इस गांव की दस बेटियां पहली बार हाईस्कूल की परीक्षा देने जा रही हैं। लोहता से लगे एक छोटे से गांव सजोई में इस परिवर्तन का सूत्रधार बनी हैं वहां की तीन बेटियां, तबस्सुम, तरन्नुम और रूबीना।

साधारण परिवार की इन तीन बेटियों ने हौसले के दम पर जो राह बनाई, आज वह अपने आप में न सिर्फ एक मिसाल है बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणास्रोत भी...।

लोहता से लगे सजोई गांव की तीन बेटियां, तबस्सुम, तरन्नुम और रूबीना ने तीन साल पहले अपनी इस मुहिम की शुरुआत की। इस गांव के लोगों का पढ़ाई के प्रति उदासीन रवैया ही था जो गांव का इकलौता मदरसा करीब 17 साल से बंद पड़ा था।

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बेटियों की शिक्षा की हालत तो और भी खराब थी। तब इन तीनों बेटियों ने अपनी कोशिश से न सिर्फ उस मदरसे को फिर से शुरू किया बल्कि इसका नाम भी ‘तरक्की सेंटर मदरसा अंसारुल उलूम’ रखा।

इसके बाद तो जैसे लहर चल पड़ी। बच्चों को मदरसे से जोड़ने के साल दो साल बाद वे उनका दाखिला स्कूल में करवा देती हैं। अब तक करीब दो सौ से अधिक बच्चों को उन्होंने स्कूलों में दाखिला करवाया है।

तबस्सुम, तरन्नुम और रूबीना, इस गांव की सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी बेटी हैं। इस पर न सिर्फ उनके अम्मी-अब्बू बल्कि गांव के बड़े बुजुर्ग सभी नाज करते हैं। उनकी पहल पर ही गांव की 10 बेटियां इस साल हाईस्कूल की परीक्षा देंगी।

इतना ही नहीं, ये गांव की महिलाओं और लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई, फ्लावर मेकिंग, पॉट मेकिंग जैसी अन्य विधाओं की भी ट्रेनिंग दे रही हैं। तबस्सुम और तरन्नुम दोनों बहनें हैं, रूबीना उनकी दोस्त।

जब उन्होंने इसकी शुरुआत की थी तो गांव के बच्चों को पढ़ाई के लिए लाना आसान नहीं था। घर- घर जाकर लोगों को इसके लिए राजी करना बड़ा काम था। इसमें उन्हें काफी दिक्कतें आईं लेकिन अब तो जैसे पूरे गांव वाले उनके साथ हैं।

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उनके हर प्रयास में सहभागिता के साथ उन्हें प्रोत्साहित भी करते हैं। शिक्षा की रोशनी बिखेरने की तबस्सुम, तरन्नुम और रूबीना की इस पहल के लिए 24 मार्च 2012 में मुंबई में अभिनेता आमिर खान ने उन्हें पुरस्कृत उनका उत्साह बढ़ाया।

अवार्ड के साथ उन्हें अपनी इस कोशिश को जारी रखने के लिए नगद पुरस्कार भी दिए। यह धनराशि भी इन बेटियों ने अपने गांव के बच्चों की पढ़ाई पर लगा दी। अब मदरसे में पढ़ाई-लिखाई के साथ कंप्यूटर के जरिये बच्चों को इंटरनेट ज्ञान से भी जोड़ा जा रहा है।
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