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रुके रुके से बढ़े कदम और हर आंख हुई नम

सुमंत मिश्र/मुंबई

Updated Mon, 19 Nov 2012 01:55 AM IST
bal thackeray cremated uddhav raj perform last rites
अरब सागर के किनारे बसे मुंबई महानगर ने रविवार को एक अभूतपूर्व दृश्य देखा। लाखों लोगों ने नम आंखों और मौन वाणी से अपने ‘सेना नायक’ शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे को अंतिम विदाई दी।
सेना नायक के बांद्रा स्थित आवास मातोश्री से लेकर दादर स्थित शिवाजी पार्क तक के छह किलोमीटर तक इस अंतिम यात्रा में अगर कुछ था तो सिर्फ अपार जन सैलाब।

उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए उसी शिवाजी पार्क में रखा गया जहां से बाला साहब ठाकरे के सेना नायक बनकर उभरने की प्रक्रिया शुरू हुई थी और वर्षों-वर्ष तक लोगों ने अपने इस लोकप्रिय नेता की दहाड़ती आवाज सुनी थी। लेकिन आज वह दहाड़ मौन थी और लोग उस आवाज को अब कभी न सुन पाने की कसक लिए सुबकते हुए दोनों हाथ जोड़कर अंतिम प्रणाम कर रहे थे।

पूरा शिवाजी पार्क ‘बाला साहेब अमर रहें’ के जयघोष से गूंज रहा था। जिस नारे की गूंज सबसे ज्यादा सुनाई पड़ी वो थी-मराठी वाघ गेला, महाराष्ट्र ची शान गेला, साहेब या शब्दा चा मान गेला (मराठा बाघ चला गया, महाराष्ट्र की शान चला गया, साहब... शब्द का मान चला गया)।

मातोश्री से दादर स्थित शिवाजी पार्क तक का 6 किलोमीटर का रास्ता तय करने में 6 से 7 घंटे तक का समय लगा। लगभग तीन बजे उनकी अंतिम यात्रा सेना भवन पहुंची। वहां पर मौजूद हजारों की भीड़ के कारण यात्रा आधे घंटे रुकी रही। बाद में उद्धव ठाकरे ने लोगों से अपील की कि वे अपने भगवान को अपने मंदिर तक जाने का रास्ता दें।

उसके बाद सेना भवन के अंदर उनका पार्थिव शरीर ले जाया गया। जहां पर 20 मिनट तक उनका पार्थिव शरीर रखा गया। यहां पर शिवसेना नेताओं, सांसदों, विधायकों, नगरसेवकों और शाखा प्रमुखों ने श्रद्धासुमन अर्पित किए। उसके बाद उनकी अंतिम यात्रा शिवाजी पार्क के लिए रवाना हुई।

जहां एक ओर अंतिम यात्रा में 4 से 5 लाख लोगों का जन सैलाब शामिल था वहीं पूरे मुंबई महानगर में अघोषित कर्फ्यू का माहौल देखने को मिला और आम मुंबईकर गम में डूबे हुए थे। हर तरफ सन्नाटा परसा था, सड़कें सूनी थीं, दुकानें बंद थी, हमेशा भरी रहने वाली लोकल ट्रेनें पटरी पर दौड़ तो रही थीं लेकिन उसके अंदर यात्रा करने वाली भीड़ नदारद थी। लोकल ट्रेनों की स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर भी इक्के-दुक्के लोग ही दिखाई पड़े।

बाला ठाकरे की अंतिम यात्रा के दौरान पूरे रास्ते में लाखों लोग जहां सड़क के किनारे खड़े थे, वहीं रास्ते में पड़ने वाले मकानों की छतों और बालकनी पर हजारों लोग ठाकरे के अंतिम दर्शन के लिए खड़े थे। यहां तक कि रास्ते में होर्डिंग और पेड़ों पर भी लोग खड़े नजर आए। जहां-जहां से यात्रा गुजरी लोग फफक-फफक कर रोते दिखे। शिवाजी पार्क में उनके अंतिम संस्कार के समय एक अनुमान के अनुसार 12 से 15 लाख लोग मौजूद थे, जिनमें 3 लाख से अधिक महिलाएं और बच्चे शामिल थे।

महाराष्ट्र के कोने-कोने से विशेषकर नागपुर, संभाजीनगर, कोल्हापुर, पुणे, नासिक, मराठवाड़ा और विदर्भ से हजारों शिवसैनिकों का जमावड़ा यहां लगा। वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे से 6 से 8 हजार गाड़ियों में लोग आए, वहीं ईस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे से 12 से 14 हजार गाड़ियों पर लोग अपने नेता के अंतिम दर्शन के लिए आए। रास्ते में कई स्थानों पर पानी और चाय के साथ ही लोग खाने के पैकेट भी बांटते देखे गए।

अंतिम यात्रा सकुशल पूरी होने पर मुंबई पुलिस व प्रशासन से राहत की सांस ली। वैसे तो शनिवार को भरी दोपहरी से ही पूरे महानगर में शांति पसरी हुई थी और सब कुछ सामान्य चल रहा था। यह सिलसिला रविवार को शाम ढलने तक नजर आया। प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। यहां तक कि जिस ट्रक पर बाला साहेब का पार्थिव शरीर मातोश्री से शिवाजी पार्क तक लाया गया वह रैपिड एक्शन फोर्स, आरएसएफ और मुंबई पुलिस के जवानों के साथ ही हजारों कर्मठ शिवसैनिकों के सुरक्षा घेरे की देखरेख में चल रहा था।

राजकीय सम्मान से शुरू हुई विदाई
-सुबह नौ बजे मातोश्री बंगले से बाला साहब के पार्थिव शरीर को कंधे पर लेकर उद्धव और आदित्य ठाकरे के साथ जयदेव व बिंद्रा ठाकरे के बेटे जयदीप और निहार बाहर आए। बाला साहब का पार्थिव शरीर हमेशा की तरह भगवे रंग के कपड़े में लिपटा था और हमेशा की तरह आंखें पर काला चश्मा लगा था। जैसे ही पार्थिव शरीर पुलिस अधिकारियों को सौंपा उसके बाद उद्धव फूट-फूट कर रोने लगे। पिता को इस तरह रोता देख बेटे आदित्य ढाढस देते नजर आए और कंधे पर हाथ रख कर उन्हें सांत्वना दी।

मुंबई पुलिस की ओर से बाला साहब के पार्थिव शरीर पर तिरंगा ओढ़ाया गया और पुलिस बैंड की टुकड़ी ने मातमी धुन बजाई। एसआरएफ के जवानों की एक टीम ने राइफल झुकाकर शिवसेना प्रमुख को अंतिम सलामी दी। इसके बाद मुंबई पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर फूलों और भगवा झंडे से सजे ट्रक पर बनाए गए मंच पर रखा। पूरे राजकीय सम्मान के बाद लगभग दो से ढाई घंटे देरी से बाला साहब की अंतिम यात्रा शुरू हुई। इस यात्रा में उद्धव के साथ भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे, सांसद संजय राउत, आरपीआई नेता रामदास आठवले, शिवसेना के विधान सभा में विपक्ष के नेता रामदास कदम भी मौजूद थे।

राज चले पैदल, नहीं गए सेना भवन
-उद्धव सुबह 9 बजे सबसे पहले मातोश्री से बाहर निकले और पुलिस के अधिकारियों के साथ सारे इंतजाम का जायजा लिया। फिर उनकी पत्नी रश्मि, छोटे बेटे तेजस, राज ठाकरे की पत्नी शर्मिला उनके बेटे अमित व बेटी उर्वशी, स्मिता ठाकरे और उनके बेटे राहुल व ऐश्वर्य बाहर आए। सभी ट्रक पर सवार हुए। इसके बाद ठाकरे परिवार के अन्य सदस्य और शिवसेना नेता मनोहर जोशी, संजय राउत, सुभाष देसाई, मिलिंद नार्वेकर भी सवार हुए।

अंतिम यात्रा के पूरे रास्ते उद्धव अपने बेटे आदित्य के साथ दोनों हाथ जोड़कर लोगों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते रहे। बीच-बीच में वह फफक-फफ क कर रोते भी दिखे। राज ठाकरे अपने कुछ कार्यकर्ताओं के साथ ट्रक के आगे पैदल चल रहे थे। लेकिन शिवसेना भवन के दो किलोमीटर पहले मांटुगा के पास से वह शिवाजी पार्क स्थित अपने निवास स्थान कृष्ण कुंज चले गए। बाद में जब बाला साहब का पार्थिव शरीर शिवाजी पार्क में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया तो राज वहां नजर आए।

अधूरा रह गया सपना
- बीती 24 अक्तूबर को शिवाजी पार्क में दशहरा रैली के दिन वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के माध्यम शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने अपना अंतिम भाषण दिया था। उन्होंने कहा, ‘मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं शिवतीर्थ पर आऊं, तुम सबसे मिलूं, लेकिन शरीर से थक गया हूं। ठीक से चल भी नहीं पा रहा हूं। ऐसे में शिवतीर्थ पर आकर तुमसे क्या बोलूं।

मैंने उद्धव और आदित्य को चुना है, दोनों को तुम्हारे हवाले कर रहा हूं। आगे उनका ध्यान रखना। मैं 47 साल से शिवसेना के प्रमुख की कमान संभाल रहा हूं, लेकिन अब और आगे नहीं चल सकता। मैं थक गया हूं शरीर से। मां जगदंबा ने शक्ति दी तो मैं आऊंगा, भाषण करूंगा।’ लेकिन बाला साहब की यह इच्छा अधूरी रह गई और उसी शिवाजी पार्क में उनका पार्थिव शरीर लाया गया। यहीं पर उनका अंतिम संस्कार भी किया गया।

अमिताभ ने लिखी ब्लॉग पर बाबू जी की कविता
- बाला साहब के निधन के बाद रविवार को अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर पिता हरिवंश राय बच्चन की ‘अग्नि देश से आता हूं मैं’ कविता लिखकर श्रद्धांजलि दी। उन्होंने लिखा कि बाला साहेब हमारे बीच नहीं रहे। ऐसी कल्पना भी मैं नहीं कर सकता। इस दुख की घड़ी में मुझे अपने पिता की यह कविता याद आ रही है... ‘अग्नि देश से आता हूं मैं/झुलस गया तन/झुलस गया मन/झुलस गया कवि-कोमल जीवन/किंतु अग्नि वीणा पर अपने दग्ध कंठ से गाता हूं मैं/अग्नि देश से आता हूं मैं/स्वर्ण शुद्ध कर लाया जग में/उसे लूटता आया मग में/दीनों का मैं वेश लिए/पर दीन नहीं हूं/दाता हूं मैं/अग्नि देश से आता हूं मैं/तुमने अपने कर फैलाए/लेकिन देर बड़ी कर आए/कंचन तो लुट चुका पथिक/अब लूटो राख लूटता हूं मैं/अग्नि देश आता हूं मैं।’

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