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अयोध्या 20 साल बादः विवाद के बाद खोया ‘अर्थ’

लखनऊ/ब्यूरो

Updated Thu, 06 Dec 2012 09:06 AM IST
ayodhya 20 years dispute lost meaning
6 दिसंबर 1992, अयोध्या के इतिहास में न भुलाया जाने वाला दिन। इस दिन हुई घटना के कारण अयोध्या न केवल अनगिनत बार सुर्खियों में आई बल्कि लखनऊ से दिल्ली तक देश की राजनीति को भी अनेक बवंडर दिए।
बवंडर का गुबार थोड़ा थमा, तो अयोध्या को इन बीस साल में हुए नफा-नुकसान की तरफ भी नजर गई। हकीकत यह है कि सियासी हलचलों की सुर्खियां बनने के साथ विकास की राह पर अयोध्या और बंजर ही होती गई।

अयोध्या का अर्थशास्त्र बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं पर ही निर्भर है। मंदिर-मसजिद विवाद के चलते न केवल स्थानीय कारोबार सुस्त हुआ बल्कि सड़क, पानी, स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी अपेक्षित तौर से विकसित नहीं हो पाई। अयोध्या का मिजाज समझने वालों की मानें तो तनाव व टकराव के माहौल के कारण अयोध्या का सहज सौन्दर्य भी तिरोहित हुआ।

पुश्‍तैनी काम से घर चलाना हुआ मुश्किल
छोटी देवकाली मंदिर के पास खड़ाऊं बेचने वाले 60 साल के मो. सलीम बाप-दादों के जमाने से यह काम कर रहे हैं, पर अब उदास है। कहते हैं, अब इस काम से घर नहीं चलता। वजह, पिछले सालों में बिगडे़ माहौल के कारण अयोध्या में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में कमी।

बकौल सलीम विवाद के पहले अयोध्या में मेलों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते थे, उस दौरान एक दिन में दो दर्जन जोड़े से अधिक खड़ाऊं बिक जाते थे, पर अब दिन में दो जोड़े भी बिक जाएं तो गनीमत समझिए। बताते हैं कि हालात इतने बिगड़ गए हैं कि अब अपना काम करने के बजाय वाराणसी, हरिद्वार व मथुरा के बाजारों में खड़ाऊं सप्लाई करने वालों का काम करके किसी तरह परिवार का पेट पालता हूं।

पुश्तैनी धंधा होने के बजाय उन्होंने बच्चों को इस काम में न लगाकर उन कामों में लगाया जिससे रोटी आसानी से चल सके।

कम हुई मूर्तियों की बिक्री
यह दर्द अकेले सलीम का नहीं है बल्कि स्थानीय स्तर पर छोटा-मोटा कारोबार करने वाले तमाम लोगों का है। वह सलीम की दुकान के सामने मूर्तियां बेचने वाले जानकी लाल गुप्ता हों या कोई और। करीब 28 साल से दुकान चला रहे जानकी बेबसी के साथ बताते हैं कि शुरुआती दौर में काम खूब चला।

देवी-देवताओं की मूर्तियां तो बिकती ही थीं। श्रद्धालु मेरा हुनर देख अपने माता-पिता की भी प्रतिमाएं बनवाने का ऑर्डर देते थे। अब हाल बेहाल है। विवाद के चलते श्रद्धालु कम हो गए हैं और जो भी आते हैं वे ज्यादातर स्थानीय और निम्न मध्यम वर्ग के होते हैं, वे छोटे-मोटे सामान से अधिक कुछ नहीं खरीदते।

सुग्रीव किला के सामने स्थित बिड़ला धर्मशाला के मैनेजर पवन सिंह बताते हैं कि इस समय करीब 3000 श्रद्धालु रोजाना आते हैं, 1992 से पहले इनकी संख्या 5000 से अधिक थी। बकौल पवन (1989 से अयोध्यावासी) बात केवल संख्या की नहीं। पहले आने वाले श्रद्धालुओं में गुजरात-महाराष्ट्र के लोग काफी अधिक होते थे, जिनकी क्रय शक्ति औरों की तुलना में काफी अधिक होती थी।

विवाद के बाद अन्य राज्यों से आने वालों की संख्या में काफी कमी आई है। अन्य राज्यों के जो थोड़े बहुत लोग अब आते भी हैं, उनमें ज्यादातर आने वाले दिन ही वापस हो जाते हैं। विभिन्न कारणों से अयोध्या बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को यहां रोक पाने में विफल हो रही है।

प्रदेश अध्यक्ष उत्तर प्रदेश युवा उद्योग व्यापार मंडल सुशील जायसवाल कहते हैं कि विवाद के कारण अयोध्या में व्यापार न पनपने की आशंकाओं के चलते कानपुर, लखनऊ व वाराणसी के व्यापारियों ने अयोध्या के कारोबारियों को उधार पर सामान देना पिछले सालों में बंद कर दिया जो बदस्तूर जारी है। आसपास के छोटे कस्बे के दुकानदारों ने अयोध्या से थोक सामान लेना कम कर दिया।

ढांचागत विकास का पहिया थमा
विवाद के शोर में रोजमर्रा के जीवन को सहूलियत देने वाले सवाल अनसुलझे रह गए। अयोध्या की गड्ढेदार  सड़कें, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं का समय के साथ विस्तार न होना इस अनदेखी को साफ बयां भी करता है। शहर को बेहतर पर्यटक स्थली के तौर पर विकसित करने के मायने में भी अयोध्या फिसड्डी रही। अयोध्या नगर पालिका के चेयरमैन राधेश्याम गुप्ता अपना दामन बचाते हुए कहते हैं कि नगरपालिका की अपनी सीमाएं हैं।

सच्चाई यह है कि किसी भी दल की सरकार ने अयोध्या के ढांचागत विकास की तरफ ध्यान नहीं दिया है। शायद यही कारण है कि विकास के लिए कुलबुलाती अयोध्या की जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में बेदाग छवि वाले 20 साल के भाजपा विधायक लल्लू सिंह के बजाय विकास के एजेंडे पर चुनाव मैदान में उतरे नौजवान तेजनारायण पांडेय को प्राथमिकता दी।

तेजनारायण अब तक कुछ कर तो नहीं पाए पर बचाव में यह अवश्य कहते रहते हैं कि अयोध्या के पर्यटन, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के विकास के संदर्भ में उन्होंने हाल ही में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लंबी बाचचीत की है। अयोध्या की सूरत संवारने की हरसंभव कोशिश होगी।

मंदिर-मसजिद विवाद के कारण जो गुबार उठा, उससे अयोध्या का सहज सौन्दर्य तिरोहित हुआ है। आग्रहों के बीच आध्यात्मिक क्षितिज के स्वाभाविक प्रकल्प-संकल्प ठंडे हुए हैं। इसकी भरपाई कौन करेगा?--डॉ. मिथिलेश नंदिनी शरण, रामकथा मर्मज्ञ

---7,000 से अधिक मंदिर हैं अयोध्या में।
---30,000 है यहां रहने वाले साधु-संतों की संख्या।
---सारी अर्थव्यवस्था बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या पर निर्भर।
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