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कांग्रेस के ‌‌लिए खुद को साबित करने की चुनौती है विस चुनाव

नई दिल्ली/ब्यूरो

Updated Thu, 04 Oct 2012 01:58 AM IST
assembly elections are challenge in front of congress  to prove itself
हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनावी शंखनाद होने के साथ ही अब कांग्रेस के सामने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश और डीजल मूल्य वृद्धि व रसोई गैस की राशनिंग से जुड़े फैसले जनता को समझाने की चुनौती खड़ी हो गई है। हालांकि दोनों राज्य भाजपा शासित होने के चलते कांग्रेस के पास वहां ज्यादा कुछ खोने के लिए नहीं है। मगर यूपीए सरकार की इस नाजुक सियासी घड़ी में कांग्रेस पर दोनों सूबों के चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव है। वहीं भाजपा के सामने भी दोनों जगह अपना गढ़ बचाने की चुनौती है। कुल मिलाकर यह महासंग्राम लोकसभा चुनाव के फाइनल से पहले के सेमीफाइनल माना जा रहा है।
खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का बेहद कड़ा फैसला लेकर कांग्रेस इस वक्त विरोधियों ही नहीं अपने सहयोगियों की आंखों की किरकिरी बन गई है। डीजल के दाम बढ़ाने और रसोई गैस पर राशनिंग के फैसलों पर सरकार को आम जनता का गुस्सा भी झेलना पड़ रहा है। आए दिन सड़कों पर सरकार के खिलाफ धरना व प्रदर्शन देखने को मिल रहा है। ऐसे में चुनाव आयोग के चुनावी शंखनाद के साथ ही कांग्रेस की चुनौती और ज्यादा बढ़ गई है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सुधारों की मंजूरी के बाद से ही कांग्रेस और सरकार मीडिया के सामने यही तर्क दे रहे हैं कि उसके फैसले आम आदमी के हित में लिए गए हैं। इसे आगे जाकर जनता को ही फायदा होगा। मगर चुनावी संग्राम में अब कांग्रेस को यह बात जनता को समझानी होगी। 20 दिसंबर को आने वाले चुनावी नतीजों से आगे की सियासत की दिशा का पता लगेगा।

कांग्रेस प्रवक्ता पीसी चाको कहते हैं कि हमें उम्मीद है कि हम अपने फैसलों के बारे में जनता को समझाने में कामयाब रहेंगे। उन्होंने दावा किया कि किसान और छोटे खुदरा व्यापारी को पार्टी यह समझाने में कामयाब हो जाएगी कि यह फैसले उनके हित में लिए गए है। साथ ही कांग्रेस ने यह भी कहा कि वह दोनों राज्यों में मुख्यमंत्री पद के लिए कोई उम्मीदवार घोषित नहीं करेगी। चाको ने कहा कि कांग्रेस में ऐसी परंपरा नहीं रही है।

चुनाव के लिए कमर कस रही भाजपा

हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा के चुनाव कार्यक्रम का ऐलान होने के साथ ही भाजपा ने अपनी तैयारी तेज कर दी हैं। दोनों राज्यों की चुनावी जंग में भाजपा अपनी सरकारों की उपलब्धियां गिनाने के साथ ही महंगाई, भ्रष्टाचार और रिटेल में एफडीआई जैसे मुद्दों पर कांग्रेस के खिलाफ ताल ठोकेगी। कोल ब्लॉक आवंटन प्रकरण से लेकर रिटेल में एफडीआई के फैसले के बीच यह चुनावी जंग होने जा रही हैं। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है। इसलिए इस चुनाव को आगामी लोकसभा चुनाव का लिटमस टेस्ट भी माना जा रहा है।

भाजपा को उम्मीद है कि देशभर में बने यूपीए सरकार खासतौर पर कांग्रेस विरोधी माहौल का उसे फायदा मिलेगा। भाजपा यह भी मान रही है कि इन चुनावों खास तौर पर गुजरात के चुनाव नतीजे आगामी लोकसभा चुनाव पर भी असर डालेंगे। सकारात्मक नतीजे नहीं मिलने पर भाजपा के लिए दिल्ली की सत्ता और दूर होती चली जाएगी। सूरजकुंड सम्मेलन से यूपीए सरकार को हटाने का बिगुल बजा चुकी भाजपा इसलिए इन दोनों राज्यों को अपने पास रखने की पुरजोर कोशिश में जुटी है। इसलिए पूरा संघ परिवार भी दोनों राज्यों के चुनाव में जुटेगा। गुजरात में तो पांच राज्यों के कर्मठ कार्यकर्ता पहले से ही काम में जुट चुके हैं।

गुजरात में तो भाजपा अपना पलड़ा भारी मान रही है, लेकिन हिमाचल प्रदेश में राजा वीरभद्र सिंह के सक्रिय हो जाने से अब कांग्रेस को कमजोर नहीं मान रही है। हालांकि पार्टी महासचिव जेपी नड्डा का दावा है कि हिमाचल में भाजपा पुराने मिथ को तोड़ लेगी। हिमाचल में कांग्रेस और भाजपा के बीच बारी बारी से सत्ता बदलने का मिथ है। नड्डा ने कहा कि अपने विकास कार्यों के चलते पंजाब में भी भाजपा-अकाली सरकार ने मिथ को तोड़ दिया था।

इधर, हिमाचल में दलितों पर भाजपा की खास नजर है। पिछले चुनाव में मात्र चार फीसदी ज्यादा वोट पाने से भाजपा को कांग्रेस से 18 सीटें ज्यादा मिल गईं थीं। तब 7.26 फीसदी वोट पाने वाली बसपा अब कमजोर दिख रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि दलित वोट सत्ता के समीकरण बदलने में खास भूमिका निभा सकते हैं।
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