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विश्व विकलांग दिवस: सकारात्मक पहल बदल सकती है कई जिंदगी

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क

Updated Mon, 03 Dec 2012 12:17 AM IST
aal set to celebrate world disabled day
देश में विकलांगों को दी जाने वाली सुविधाएं कागजों तक सिमटी हुई हैं। विकलांगों को अन्य देशों में जो सुविधाएं दी जा रही हैं उसकी एक चौथाई सुविधाएं भी यहां नहीं मिल रही।
व्हील चेयर पर चलने वाली आबादी का मानना है कि कहीं भी प्रवेश की सुविधा होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक विकलांग व्यक्ति को अपने घर से बाहर लाने, कॉलेज या दफ्तर जाने के लिए बस पकड़ने, शापिंग कांप्लेक्स जाने या अन्य सार्वजनिक इमारतों में प्रवेश की वैसी ही सुविधा होनी चाहिए जैसी सामान्य लोगों के लिए होती है।

देश में स्थिति
-- सार्वजनिक इमारतों, परिवहन प्रणाली, स्कूल, कॉलेज आदि के अंदर जाने के लिए अनुकूल सुविधाओं का न होना।
-- फुटपाथ, सरकारी कार्यालय, धार्मिक स्थान, स्कूल और विश्वविद्यालय, विकलांग व्यक्तियों के उपयोग व सहूलियत के लिहाज से असहज व असुविधाजनक हैं।
-- विकलांग प्रमाण पत्र जारी करने में स्वास्थ्य विभाग की ओर से मनमानी।
-- शिक्षा और रोजगार पाने में सामने आने वाली समस्याएं।
-- विकलांगों को कृत्रिम अंग नहीं उपलब्ध कराए जाते।
-- रेलवे प्लेटफार्म व कोच के बीच ऊंचाई कम करने की दिशा में रेलवे ने कोई खास पहल नहीं की है।
-- ऊंचाई ज्यादा होने के कारण विकलांगों को ट्रेनों में चढ़ने में परेशानी होती है।

विदेश से सीखा जा सकता है काफी कुछ
विकलांगों को विदेशों में बेहद संवेदनशील नजरिए से देखा जाता है। जन सुविधाओं में शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों की सहूलियत व सुविधा के स्तर की तुलना करें तो बड़े शहरों की बात तो दूर, वहां के छोटे कस्बे भी इन सुविधाओं के मामले में हमारे मेट्रोपोलिटन शहरों से कहीं बेहतर हैं।

दिशा-निर्देशों का पालन जरूरी
सार्वजनिक इस्तेमाल की जगहों जैसे फुटपाथ, बस स्टॉप, जन शौचालय, स्कूल, कॉलेजों, सरकारी या प्राइवेट सभी कार्यस्थलों, पार्किंग एरिया, प्रवेश द्वार और दरवाजे के निर्माण में विकलांगों को लेकर बने दिशानिर्देशों का पालन जरूरी है।

सार्वजनिक भवनों में सुविधाएं
सार्वजनिक भवनों के भारी-भरकम प्रवेशद्वार से लेकर सभी दरवाजे व कॉरिडोर के रास्ते इस सुविधा के साथ बने हैं कि व्हीलचेयर पर बैठा व्यक्ति भी बिना किसी अन्य सहायता के स्वयं ही सुगमता से आ-जा सके। सभी प्रसाधन स्थान भी इन सुविधाओं को ध्यान में रख बनाए गए हैं। लिफ्ट में खासतौर पर ऑपरेशनल स्विचों को नीचे की तरफ लगाया जाता है, जिससे विकलांग व्यक्ति को परेशानी का सामना न करना पड़े।

सड़क और फुटपाथ
फुटपाथ पर इस तरह कि पट्टियां और रैलिंग्स लगाई जाती हैं कि व्हीलचेयर पर बैठा और नेत्रहीन व्यक्ति भी सुगमता से सड़क पार कर सके। नेत्रहीनों और कमजोर नजर वालों के लिए मार्ग-चिन्ह और सूचना-स्टैंड ब्रेल लिपि में लगाए जाते हैं।

सार्वजनिक परिवहन व बस स्टैंड
सभी बस स्टैंडों पर व्हीलचेयर पर बैठे व्यक्ति के लिए जगह निर्धारित है। बस रुकने पर सबसे पहले विकलांग व्यक्तियों का प्रवेश होता है। इसके लिए बस-दरवाजों में विशेष प्रकार के हाइड्रॉलिक लिफ्टर लगे हैं जिनकी सहायता से व्यक्ति व्हीलचेयर पर बैठे ही बस के अंदर सुरक्षित व बिना असुविधा के पहुंच पाता है।

पार्क और मैदानों में
पार्कों में सीमित शारीरिक क्षमता वाले लोगों के लिए खास प्रबंध किए जाते हैं। इनमें एक निश्चित क्षेत्र में रैलिंग सपोर्ट दिया जाता है, जिससे उन्हें घूमने-फिरने में कोई तकलीफ न हो।

विकलांगों के लिए खास अस्पताल
अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया समेत कई पश्चिमी मुल्कों में सामान्य अस्पतालों के अलावा विकलांग लोगों को ध्यान में रखते हुए खास तरह के अस्पताल तैयार किए गए हैं। इन अस्पतालों इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कोई भी विकलांग व्यक्ति अकेले यहां पहुंच सके। इन अस्पतालों को विकलांगों और खासतौर पर  ऐसी बीमारियों के इलाज के लिए ही बनाया गया है जिससे विकलांगता का खतरा होता है।

...मगर इंटरनेट पर विकलांगों के लिए सुविधा नहीं
इंटरनेट पहुंच से संबंधित एक एजेंसी नोमेन्सा ने दुनिया भर के बीस देशों के पांच क्षेत्रों की अग्रणी वेबसाइटों पर कुछ वर्ष पहले शोध किया था। ये क्षेत्र थे- यात्रा, खुदरा व्यापार, बैंकिंग, सरकार और मीडिया। शोध का मकसद ये जानना था कि क्या विकलांग व्यक्ति के लिहाज से ये वेबसाइटें सुविधाजनक हैं। सर्वेक्षण के मुताबिक दुनिया की ज्यादातर वेबसाइटें ऐसी सुविधा प्रदान करने में विफल रही हैं जिससे शारीरिक रूप से विकलांग भी इनका इस्तेमाल कर सकें। सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि 97 फीसदी वेबसाइटें तो न्यूनतम आधारभूत सुविधाओं के पैमाने पर भी खरी नहीं उतरतीं।

इन मानकों पर खरी नहीं उतरतीं वेबसाइटें
-93 फीसदी वेबसाइटें ग्राफिक्स को समझ पाने के लिए पर्याप्त लिखित विवरण देने में विफल रहीं।
-73 फीसदी वेबसाइटें अपना अधिकांश काम जावा स्क्रिप्ट के जरिए करती हैं। जावा स्क्रिप्ट कम दृष्टि वाले व्यक्तियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली कुछ स्क्रीनों पर ठीक तरह से काम नहीं करती।
-78 फीसदी वेबसाइटें उन रंगों का इस्तेमाल करती पाईं गईं जिनसे कलर ब्लाइंड लोगों को समस्या हो सकती है।
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