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रेड लाइट एरिया में क्यों रहा है यह कलाकार

अमर उजाला,मुंबई

Updated Wed, 22 Jan 2014 04:17 PM IST
kadar khan, films
कादर खान को फिल्मों के दीवाने मुख्य रूप से अभिनेता के रूप में याद करते हैं। कुछ को उनकी खलनायकी पसंद है तो कोई उनकी कॉमेडी का मुरीद है। कुछ उनके ‘रंगीन’ किरदारों को भी पसंद करते हैं। लेकिन कादर खान के व्यक्तित्व की एक पहचान यह है कि वह बेहतरीन राइटर हैं।
उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत एक कॉलेज प्रोफेसर के रूप में की थी। पढ़ाने-लिखाने से जब समय मिलता था तो वे उसमें स्टेज का काम करते थे। रंगमंच उनका शौक था।

लेकिन उनके जीवन का एक अहम पहलू यह है कि वह मुंबई के बदनाम रेड-लाइट एरिया कमाठीपुरा में पले-बढ़े थे। इसके बावजूद उन्होंने खुद को ‘भटकने’ से बचाया। कादर खान के अनुसार वह लगातार चेखव और गोर्की जैसे महान लेखकों को पढ़ते थे और इनकी अच्छी बातों से ही वे गंदी संगत से बचे रहे।

कादर खान कहते हैं, ‘मेरे इन गुरुजनों ने मुझे बचा लिया।’1970 के दशक में कादर खान की पहचान एक नाटक लेखक के रूप में बनने लगी थी और फिल्म ‘जवानी दीवानी’ में पहली बार उन्हें डायलॉग राइटिंग का काम मिला।

काम के मिले 500 रुपये। इसी दौरान 1973 में उनकी मुलाकात मनमोहन देसाई से हुई। कादर खान बताते हैं, ‘वह बहुत ही मुंहफट आदमी थे। उन्होंने मुझसे कहा कि मुस्लिम लेखकों के साथ काम करने में मुझे समस्या होती है।

मैं पहले तुम्हारा काम देखूंगा। जमा तो ठीक, नहीं तो गटर में फेंक दूंगा। मैंने पूछा कि काम अच्छा लगा तो? उन्होंने कहा कि तुम्हें सिर पर बैठा कर घूमूंगा।’

कुछ दिनों के बाद कादर खान कुछ चीजें लिख कर मनमोहन देसाई के घर पहुंचे। वह बच्चों के साथ क्रिकेट खेल रहे थे। पढ़ कर वह बुदबुदाए तो कादर खान ने कहा कि आप गाली दे रहे हैं! देसाई चौंके क्योंकि बात सच थी।

उन्होंने कहा कि तुम्हें कैसे पता चला? कादर खान ने कहा कि मैं होंठों को पढ़ना जानता हूं। बाद में मनमोहन देसाई ने कादर खान को फिल्म ‘नसीब’ में ऐसे व्यक्ति का रोल दिया था, जो होंठों को पढ़ लेता है।

कादर खान बताते हैं कि उस मुलाकात में मनमोहन देसाई को मेरी लिखी चीजों को पढ़ कर सचमुख जुनून सा हो गया। वह बहुत भावुक हो गए। उन्हीं दिनों मुझे फिल्म ‘खेल खेल में’ के लेखन के लिए 25 हजार रुपये मिले थे, जो मेरे हिसाब से तब काफी थे।

मनमोहन देसाई को जब मेरी यह फीस पता चली तो उन्होंने कहा, ‘आज से मैं तुम्हें 1.25 लाख रुपये दूंगा।’ इतना ही नहीं, कादर खान से वह इतने खुश हुए कि तत्काल घर के अंदर गए और एक पोर्टेबल टेलीविजन सेट और सोने का ब्रेसलेट लाकर उन्हें दिया। इसके बाद कादर खान हमेशा के लिए मनमोहन देसाई की टीम में शामिल हो गए।

(हार्पर कॉलिंस से प्रकाशित सिद्धार्थ भाटिया की पुस्तक ‘अमर अकबर एंथोनीः मसाला मेडनेस एंड मनमोहन देसाई’ से साभार)
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