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फिरोज खान यानी भारत का क्लिंट ईस्टवुड

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क

Updated Tue, 25 Sep 2012 12:35 PM IST
indian clint eastwood feroz khan
ऊँचा कद, सिर पर हैट, हाथ में पिस्तौल, कमर में बुलेट बेल्ट और लांग लेदर शू ने भारतीय दर्शकों को उनका दीवाना बना दिया। जी हां, पूरब का क्लिंट ईस्टवुड कहे जाने वाले फिरोज़ खान का आज जन्मदिन है। फिरोज कभी सुपर स्टार नहीं रहे लेकिन उनकी स्टाइल के लोग दीवाने थे और उनकी फिल्मों का इंतज़ार करते थे। जब अपनी आखिरी फिल्म में जब वे लोगों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर रहे थे तो दर्शकों को एहसास भी था कि उनकी जिंदगी के बहुत कम दिन बचे हैं। कैंसर जैसी बीमारी का पता चलने के बाद भी उन्होंने 'वेलकम' फिल्म साइन की और अपना काम हंसते हुए किया।
बेंगलूर में 25 सितंबर 1939 को जन्मे फिरोज खान के पिता पठान और मां ईरानी थीं। फिरोज ने अपनी पढ़ाई वहीं पूरी की। बाद में एक्टर बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे और 1960 में बनी फिल्म ‘दीदी’ से अभिनय में कॅरियर की शुरुआत की। यहां शुरु हुआ उनका सफर फिर थमा नहीं। लगभग पांच दशक तक अभिनेता, निर्माता और निर्देशक रूप में फिरोज़ ने एक यादगार सफर तय किया।

फिरोज खान 70 के दशक का स्टाइल आइकन थे। इस दशक में उन्होंने 'आदमी और इंसान', 'मेला' और 'धर्मात्मा' जैसी बेहतरीन फिल्में दीं। उनकी खूबी थी कि वे छोटे से रोल में भी अपनी अलग छाप छोड़ जाते थे। रामानंद सागर की फिल्म 'आरजू' के असली हीरो राजेन्द्र कुमार थे, लेकिन छोटे रोल में फिरोज ने सबका ध्यान आकर्षित किया थी। इसी तरह असित सेन की फिल्म 'सफर' में राजेश खन्ना जैसे सुपरस्टार के होने के बाद भी फिरोज खान ने अपनी उपस्थिति दर्ज की।

कहते हैं कि उन्होंने एक्टिंग की कोई फार्मल ट्रेनिंग नहीं ली थी फिर भी उन्हें यह पता था कि कैमरे के सामने कैसे खुद को लाना है। वे हॉलीवुड अभिनेता क्लींट ईस्टवुड से इतने ज्यादा प्रभावित थे कि सत्तर के दशक में उन्होंने उसी अंदाज को अपनी एक्टिंग स्टाइल में शामिल कर लिया। गले में लाकेट, कमीज के बटन खुले हुए, ऊपर से जैकेट और शब्दों को चबा-चबा कर संवाद बोलते फिरोज खान देखते-देखते क्लिंट ईस्टवुड का देशी रूपांतरण बन गए। उस दौरान आई 'काला सोना', 'अपराध', और 'खोटे सिक्के' में उनका यह अंदाज दर्शकों को खूब पसंद आया। कुछ यही स्टाइल बाद में 'यलगार' फिल्म में भी दिखी।  

उनका यह अंदाज फिल्मी पर्दे तक ही सीमित नहीं था। वे लोगों को लुभाने की कला में माहिर थे और उन्हें लेडी किलर खान भी कहा जाता था। उनका बिंदास अंदाज और राजसी ठाट-बाट ने इंडस्ट्री में उनकी सबसे अलग छवि बनाई। अपनी साफगोई का कई बार उन्हें फायदा मिला तो कई बार नुकसान भी उठाना पड़ा। एक समय में उन्होंने पाकिस्तान की स्थिति को लेकर बयान दिया तो वहां के शासकों को वह बात इतनी बुरी लगी कि उन्हें पाकिस्तान का वीजा न देने का फैसला किया गया मगर वे अपनी राय पर अडिग रहे।

फिरोज एक सफल निर्माता-निर्देशक के रूप में भी सामने आए। उनके निर्देशन में पहली फिल्म धर्मात्मा थी, जो द गॉडफादर से प्रभावित थी। 'कुर्बानी' उनके करियर की सबसे सफल फिल्म रही। इसमें उनके साथ विनोद खन्ना भी प्रमुख भूमिका में थे। 'कुर्बानी' ने हिन्दी सिनेमा को एक नया रूप दिया। इस फिल्म में फिरोज खान और जीनत अमान की बिंदास जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया। इस फिल्म से हिन्दी सिनेमा में अभिनेत्रियां ज्यादा हॉट एंड बोल्ड रूप में सामने आईं।

खास बात यह थी कि फिरोज खान को फिल्म निर्माण के हर पहलू की बेहतरीन समझ थी। वह हमेशा नए प्रयोग करने की सोचते थे। वे हॉलीवुड से काफी प्रभावित थे और उसी शैली में फिल्में बनाना चाहते थे। 'धर्मात्मा' पहली भारतीय फिल्म थी जिसकी शूटिंग अफगानिस्तान में की गई। फिल्म 'अपराध' में उन्होंने रोमांचक कार रेस भी दिखाई। संगीत को लेकर उन्होंने कई प्रयोग किए और बिड्डू से लेकर चन्नी सिंह जैसे प्रतिभाशाली संगीतकार से बॉलीवुड को इंट्रोड्यूस कराया। कुर्बानी में नाजिया हसन का गाया गीत ‘आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए...' अपनी नशीली धुन और फिल्मांकन के कारण खूब लोकप्रिय हुआ था।

उन्हें वर्ष 1970 में फिल्म 'आदमी और इंसान' के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का पुरस्कार दिया। वर्ष 2000 में फिरोज को लाइफटाइम अचीवमेंट का फिल्फेयर पुरस्कार दिया गया। वह आखिरी बार अनीस बज्मी की फिल्म 'वेलकम' (2007) में नजर आए। फिरोज खान कैंसर से पीडि़त थे और मुंबई में उनका लंबे समय तक इलाज चला। 27 अप्रैल 2009 को उन्होंने बेंगलूर स्थित अपने फार्म हाउस में अंतिम सांस ली।
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