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मिलिए 'हिंदुस्तान के हुनरबाज' में 'कूल गुरू' टेरेंस लुईस

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- अनुराधा गोयल

Updated Wed, 24 Oct 2012 11:27 AM IST
exclusive interview of choreographer terence lewis
भारतीय नृत्य निर्देशक टेरेंस ‍लुईस को आप जी टीवी के डांस रियलिटी शो 'डांस इंडिया डांस' में गीता कपूर और रेमो डिसूजा के साथ बतौर जज के रूप में देख चुके हैं। लाइफ ओके पर 22 अक्तूबर से प्रसारित हुए 'हिंदुस्तान के हुनरबाज' में कूल गुरू के रूप में दिखाई देने वाले टेरेंस ने हाल ही में अमर उजाला से खास बातचीत की। पेश है अनुराधा गोयल की टेरेंस लुईस की बातचीत के कुछ अंशः
आप शो के बारे में बताइए? आपके शो का कॉन्सेप्‍ट क्या है?
'हिंदुस्तान के हुनरबाज' ये एक ऐसा कॉन्सेपट है जहां 5 से 15 साल तक के बच्चे हैं। हम इस मंच पर हर तरह से टैलेंट से ओतप्रोत बच्चों को मौका देते हैं। टैलेंट कोई भी हो फिर चाहे वो सिंगिंग हो, डांस हो, म्यूजिक हो, स्केटिंग हो। यानी ऐसा टैलेंट जिसमें बच्चा परफेक्ट हो, बच्चे अपने टैलेंट को उस लेवल तक लेकर गए हैं जहां तक हमें लगता है कि वो हुनरबाज कहलाने के लायक हैं तो हम उन्हें हमारे मंच पर बुलाएंगे और उन्हें परफॉर्म करने का मौका देंगे।

जिससे वे अपने हुनर का प्रदर्शन करें। हम उनसे उनके हुनर के बारे में बात करेंगे कि कैसे उन्होंने अपने हुनर को पाया, कैसे इस मुकाम तक पहुंचे। उनकी क्या मंजिल हैं, वो आगे इसे कैसे ले जाएंगे। उनको हम प्रोत्साहित करेंगे और सच्चे हुनरबाज को 15 हजार रूपए का चैक और गोल्ड मेडल देंगे। दरअसल, हमारा मकसद है कि हम हर बच्चे में कुछ खास ढूंढे और बच्चों के पेरेंट्स को ये विश्वास दिलाएं कि बच्चों को सिर्फ मोटीवेशन की जरूरत है, वो अपने टैलेंट को और अधिक निखार सकते हैं।

आप ‌‌सिर्फ बतौर जज यहां पर है या फिर कोरियोग्राफ भी करेंगे?
ये टैलेंट शो है तो इसमें डांस ही नहीं बल्कि सिंगिंग, म्यूजिक, गायकी, शास्‍त्रीय संगीत, मार्शल आर्ट कोई भी आर्ट हो वो दिखेगी। मैं यहां पर जज नहीं बल्कि कूल गुरू बनकर रहूंगा। इस शो में हमारे तीन उसूल हैं। नो रोना-धोना, क्योंकि यहां कोई रिजेक्ट नहीं होने वाला। नो रिपोर्ट कार्ड्स, यहां कोई मार्क्स नहीं मिलने वाले, सिर्फ आओं और एन्जॉय करो। नो कॉम्पटीशन ओन्ली सेलिब्रेशन। यहां हम बच्चों को बताएंगे कि उनको क्‍या और कैसे अपने आपको इंप्रूव करना चाहिए क्योंकि आजकल के बच्चों को ऐसे गुरू की जरूरत होती है जो उनका मार्गदर्शन कर सकें।

तो क्या ये वर्क शॉप है या रियैलिटी शो?
नहीं ये रियैलिटी शो है, जहां हम बच्चों को जिम्मेदारी नहीं दे रहे बल्कि उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं, हम बच्चों के हुनर के बारे में बात करना चाहते हैं। ताकि और बच्चे भी जान सकें कि कैसे वो हुनरबाज बनें। उन्हें कितनी मेहनत लगी। कितने सालों तक उन्होंने काम किया। उस दौरान उनका साथ किसने दिया, कैसे काम करना पड़ता है।

इससे बच्चों और पेरेंट्स को सीख मिलेगी कि वे अपने बच्चों के हुनर को कैसे पहचानें। मुझे लगता है कि बच्चे इस बात को पहचानें कि कॉम्पटीशन सिर्फ अपने आपसे होना चाहिए किसी और के साथ नहीं। एक बच्चे की दूसरे बच्चे के साथ तुलना करना गलत बात है। एक वैराइटी टैलेंट शो में गाने वाले बच्चे के डांस करने वाले बच्चे से तुलना नहीं कर सकते।

इस शो का मकसद क्या है?
आजकल बच्चे कॉम्पटीशन के कारण काफी एग्रैसिव, वाइलेंस होने लगे हैं या वो सोसाइड करने लगे हैं। बच्चे डिप्रेशन का शिकार होने लगे हैं। एक हुनर के साथ यदि बच्‍चे में कुछ खास है तो बच्चे को आश्वाशन हो जाता है कि मुझमें भी कुछ खास है, मैं भी किसी से कम नहीं हूं चाहे, कुछ और चीज में कोई और मुझसे अच्छा है, मैं एक में तो कम से खास हूं। हमारा मकसद भी यहां बच्चों को डांटना या रिजेक्ट करना नहीं है। यहां कोई नेगेटेविटी नहीं है। ये शो बच्चों में सकारात्मक सोच लाने के लिए है। यानी इस शो को आप इनोसेंट, प्योर, डिसेंट, यूनिक, वैरी हाई ऑन टैलेंट, वैरी-वैरी पॉजिटिव कह सकते हैं।

आपके हिसाब से न्यूकमर को कोरियोग्राफ करना कितना मुश्किल होता है?
हर इंसान में एबीसीडी की क्षमता होती है यानी एनी बॉडी कैन डांस। कोई भी इंसान डांस कर सकता है लेकिन डांसर बनने के लिए केवल एबीसीडी की ही जरूरी नहीं बल्कि इससे कहीं अधिक होना चाहिए। यानी सीखने की क्षमता, टैलेंट, अनुसाशन स्किल होना जरूरी है। यदि कोई अच्छा डांसर है तो उसे कोरियोग्राफ करना बहुत आसान हो जाता है। हम एक आइडिया को, एक संगीत को लेते हैं तो कोरियोग्राफी और भी आसान हो जाती है।

कई शोज में बच्चों को एक सप्ताह में अलग-अलग डांस स्टाइल दिए जाते हैं, ऐसे में उनके साथ कोरियोग्राफ करना कितना मुश्किल होता है?
ऐसे बच्चों के साथ कोरियाग्राफ करना बहुत आसान होता है। वो बच्चे मंझे हुए होते हैं। बहुत उम्दा किस्म का टैलेंट होता है उनमें। आप डीआईडी को देखेंगे तो ऐसे शोज में आने वाले बच्चे देशभर में कुल 5 फीसदी हैं जिनमें कॉम्पटीशन का रिजेक्‍शन, स्ट्रेस उसके प्रेशर को संभालने का भी हुनर होता है।

ऐसे बच्चे बढ़ते कॉम्पटीशन के साथ ही ज्यादा अच्छा परफॉर्म करने लगते है क्योंकि उनमें वो काबिलियत है, उनका मैंटल फ्रेम वर्क उसी के लिए बना है। हालांकि 95 फीसदी बच्चे भी टैलें‌टेड होते हैं, लेकिन वो कॉम्पटीशन का दबाव नहीं झेल पाते। उन्हें ये लगता है कि वो अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाएंगे। ऐसे में 'हिंदुस्तान के हुनरबाज' शो इन 95 फीसदी बच्चों के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा।
 
आज के समय में डांस का कॉन्सेप्ट, डांस स्टाइल्स सबका मिक्‍चर बन गया है, इसके बारे में आप क्या कहेंगे?
मुझे लगता है कि नई पीढ़ी अपने साथ बहुत कुछ नया लेकर आ रही है। ऐसे में थोड़ी आधुनिक चीजें और प्राचीन चीजों को लेकर चलें और आज के इश्यू को लेकर, थीम बेस्ड डांस परफॉर्मेंस तैयार करें तो ये इंटरस्ट‌िंग भी होता है। इससे हम कुछ नया कर सकते हैं। डिफरेंट स्टाइल्स को मिलाकर डांस तैयार करते हैं तो इससे डांस फॉर्म में प्योरिटी और नयापन आता हैं। डिफरेंट कल्चर से रूबरू होते हैं।

ऐसा माना जाता है कि क्लासिकल डांसर ही अच्छा डांसर होता है क्या यह सही है?
ऐसा नहीं है। आपकी जो मनोवृति है। आप बहुत ज्यादा अनु्शासन में रहते हो, आपके घर में क्लासिकल डांस की अहमियत को पहचाना जाता हैं तो ऐसे में बच्चे के लिए फायदेमंद होता है कि वो क्लासिकल डांस सीखे। यदि पेरेंट्स डांस के बारे में जानकारी नहीं रखते और वो बच्चे को हिप हॉप या वेस्टर्न डांस सीखाना चाहते हैं तो भी बच्चा डांस सीख सकता है क्योंकि ये बच्चे के नेचर और इंटरस्ट पर डिपेंड करता है कि बच्चा क्या करना चाहता है। डांस की कोई फॉर्म खराब नहीं होती। बच्चे में सीखने की क्षमता होनी चाहिए। हर डांस फॉर्म की अपनी एक खासियत, अपनी विशेषता है।

आज के समय में डांसर्स और कोरियोग्राफर्स का क्या स्कोप है?
आज के समय में काफी अच्छा स्कोप है। आज अच्छे प्रोफेशनल डांस के स्कूल हैं जहां बच्चे आसानी से डांस की ट्रेनिंग ले सकते हैं। आप डांस टीचर, कोरियोग्राफर बन सकते हैं, कहीं नौकरी कर सकते हैं लेकिन इसके लिए जरूरी है कि आप सही ट्रेनिंग ले, ताकि आपको डांस की फॉर्म की सही जानकारी हो, सही तकनीक मिलें, आप डांस में परफेक्ट बन सकें। लेकिन इसके लिए आपको मेहनत करने की जरूरत होगी। आप अपना खुद का एक ग्रुप बना सकते हैं, खुद का इंस्टीट्यूट खोल सकते हैं। हर जगह आजकल डांसर्स और कोरियोग्राफर्स की जरूरत होती है।

आप इस शो में कूल गुरू हैं, आपके साथ ही सोनाली बेंद्रे भी हैं तो उनकी क्या भूमिका रहेगी?
आपने सोनाली बेंद्रे को 'इंडिया गॉट टैलेंट' में देखा होगा, अब वो 'हिंदुस्तान के हुनरबाजों' की गुरू है यानी वो मेरी को-गुरू हैं। सोनाली एक बेहतरीन अभिनेत्री हैं। वो बहुत ही कूल पर्सन है। वो एक मां भी है, वो बच्‍चों के इमोशंस और उनके बिहेवियर से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। काफी हसीन, मोटिवेटिंग, सकारात्मक, इनकरेजिंग है। जिससे बच्‍चों को बहुत सपोर्ट मिलेगा। वो भी मेरी तरह बच्चों की कूल गुरू ही हैं।

आमतौर पर रियैलिटी शोज में 3 या 4 जज दिखाई पड़ते हैं लेकिन आपके शो में आप और सोनाली जी हैं ऐसा क्यों?
क्योंकि जरूरत नहीं पड़ी, हमें बच्चों को इनकरेज करना है, मोटीवेट करना है, यदि दो से ज्यादा लोग ये काम करेंगे तो ये बच्चों के लिए भी ठीक नहीं। जबकि एक कॉम्पटीशन शो में हर जज के अलग-अलग विचार होते हैं जो कॉम्पटीशन को अधिक स्ट्रॉन्ग बना देता हैं। नॉन कॉम्पटीशन शो में दो जज भी बहुत है। तीसरे जज का कोई सेंस ही नहीं बनता क्योंकि यहां कोई अनबन नहीं होने वाली। वैसे तमाशा देखने के लिए बहुत सारे लोगों की जरूरत होती है लेकिन पीसशुल शो में कम लोग ही अच्छे रहते हैं।
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