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विकासशील देशों में 10 फीसदी से अधिक दवाएं नकली

जेनेवा/एजेंसी

Updated Wed, 14 Nov 2012 10:10 PM IST
more than 10 percent of fake medicines in developing countries
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के मुताबिक विकासशील देशों में बिक रही 10 फीसदी दवाएं या तो नकली हैं या फिर घटिया स्तर की हैं। डब्लूएचओ के मुताबिक सबसे ज्यादा नकली दवा मलेरिया के उपचार के लिए बिकने वाली दवाओं के रूप में हैं। क्योंकि, एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर हिस्से में इस बीमारी का सर्वाधिक प्रकोप है। इसलिए इसके उपचार की दवाओं की यहां सबसे ज्यादा मांग है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, विकासशील देशों के साथ ही नकली दवाओं के कारोबार का खतरा विकसित देशों में भी कम नहीं है। फार्मा कंपनी रोश की ओर से कैंसर के उपचार के लिए बनाई गई सबसे प्रभावी दवा एवास्टीन की नकल हाल ही में अमेरिकी बाजार से बड़ी संख्या में जब्त की गई है।

इसके अलावा मिनिंजाइटिस के उपचार के लिए लगाए जाने वाले स्टेरायड इंजेक्शन भी बड़ी संख्या में यहां नकली पाए गए हैं। यूरोपीय संघ की बात करें तो यहां जब्त की जाने वाली नकली वस्तुओं में भी सबसे बड़ी संख्या नकली दवाओं की ही है। हैरानी की बात यह है कि जो नकली दवाएं मिल रही हैं, उनमें सैनोफी, एली लिलि और एस्ट्राजेनेका जैसी नामीगिरामी दवा कंपनियों के नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है।

विदेशी मुल्कों की सरकारें दे रही हैं शह: भारत
भारत का आरोप है कि उसके यहां बनने वाली जेनेरिक दवाओं से मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्द्धा को देखते हुए विदेशी मुल्कों की सरकारें अपने यहां की दवा कंपनियों को शह दे रही हैं। इसी कारण बाजार में नकली दवाओं का कारोबार फलफूल रहा है। यही वजह है कि भारत ने अगले सप्ताह ब्यूनस आयर्स में इस मसले पर डब्लूएचओ की प्रस्तावित बैठक में दवा कंपनियों की भागीदारी पर सख्त एतराज किया है। ब्राजील ने भी इस मामले में भारत का समर्थन किया है। हालांकि, इस बैठक में कई गैर सरकारी संगठन और विशेषज्ञ भी अपनी राय रखने के लिए लालायित हैं लेकिन उन्हें इसमें शरीक नहीं किया जा रहा है।  

दवा कंपनियों व सरकार की मिलीभगत: अतारन
नकली दवाओं के बारे में अपने लेखों के जरिए जागरुकता फैलाने वाले ओटावा विश्वविद्यालय के अमीर अतारन ने बताया कि उन्हें और कई गैर सरकारी संगठनों को अगले सप्ताह ब्यूनस आयर्स में इस मसले पर डब्लूएचओ की प्रस्तावित बैठक में आमंत्रित नहीं किया जा रहा है। अतारन ने इसे एक घोटाला बताते हुए कहा कि यह दवा कंपनियों और सरकार के बीच मिलीभगत है, इसलिए वह नहीं चाहते कि अन्य लोग बैठक में हिस्सा ले पाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि बैठक में सभी पक्षों की राय ली जानी चाहिए ताकि नकली दवाओं का कारोबार रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी कानून बनाया जा सके।
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