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भारत-चीन व्यापार को नए दौर में ले जा सकते हैं जिनपिंग

नई दिल्ली/ब्यूरो

Updated Thu, 15 Nov 2012 10:30 PM IST
jinping can take india china trade in new round
चीन का नया नेता चुने जाने के बाद शी जिनपिंग द्वारा आर्थिक सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ाते हुए अर्थव्यवस्था को उदार बनाने का वादा किए जाने के बाद माना जा रहा है कि भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय कारोबार में तेजी आएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि 2008 की मंदी से कुप्रभाव से भारत के बचे रहने के बाद चीन ने अब भारत को दुनिया की एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रूप में देखना शुरू कर दिया है।
ऐसे में वह 1962 के युद्ध के बाद करीब 50 वर्षों से चली आ रही कड़वाहट को किनारे कर आर्थिक और कारोबारी मोर्चे पर भारत के साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाना चाहेगा। हाल के दिनों में चीनी सरकारी मीडिया में इस दिशा में चीन के नरम पड़ते रुख के स्पष्ट संकेत मिले हैं, जिसे जिनपिंग के कार्यकाल में एक नई शुरुआत की भूमिका के रूप में भी देखा जा रहा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार वर्तमान 75 अरब डॉलर से बढ़कर 2015 तक 100 अरब डॉलर को पार कर जाने की संभावना है।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) की 18वीं केंद्रीय समिति का महासचिव चुने जाने के बाद बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में जिनपिंग ने कहा कि हम आर्थिक सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने तथा बाजार खोलने के लिए पूरी पार्टी तथा चीन के सभी समुदाय के लोगों प्रेरित करेंगे। हमने पार्टी की ओर से यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी ली है। इसके साथ ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) के नवनिर्वाचित महासचिव जिनपिंग ने चीन में भ्रष्टाचार और लीलफीताशाही खत्म करने का आह्वान किया, जिसे आर्थिक नीतियों में उदारीकरण की शुरुआत के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

चीन पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि 1962 के युद्ध की कड़वी याद अब भी भारत के रणनीतिक समुदायों और जनमानस में बनी हुई है, लेकिन इसने भारत को चीन के साथ रिश्ते बढ़ाने की बहुमुखी नीति पर आगे बढ़ने से नहीं रोका है। दूसरी ओर 2008 की मंदी का दबाव भारत की अपेक्षा कहीं अधिक झेलने के बाद चीन को भी अब इस बात का अहसास होने लगा है कि अर्थव्यवस्था और व्यापार के मामले में भारत को नजरअंदाज करके वह अब आगे नहीं बढ़ सकता।

चीन के रुख में भारत के प्रति इस बदलाव की झलक बीते माह उस वक्त देखने को मिली जब चीन के एक सरकारी समाचार पत्र में कहा गया कि वह स्थितियां अलग थीं जब चीन पाकिस्तान का मददगार बना था। अब वह भारत के साथ आर्थिक सहयोग करते हुए भारतीय बाजार में अपनी पहुंच बढ़ाना और भारत के साथ कारोबार बढ़ाना चाहता है। कारोबार संबंधी आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते दिखते हैं जिनके मुताबिक दोनो देशों के बीच व्यापार 75 अरब डॉलर को पार कर चुका है और चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है।

चीन एक ओर अपने उत्पादों के लिए भारत के बाजार में हाथ आजमाना चाहता है, दूसरी ओर भारत आधारभूत संरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) क्षेत्र में चीन से अधिकाधिक निवेश हासिल करने की कोशिश कर रहा है, जो तमाम सुरक्षा चिंता के बाद भी 40 अरब डॉलर को पार कर गया है। हालांकि इस सबके बावजूद दोनों देशों के बीच सदियों से चले आ रहे अविश्वास का पूरी तरह खत्म हो पाना कतई आसान नहीं दिखता। चीन एक ओर तो आर्थिक सहयोग बढ़ाने की बात करता है, पर बीच-बीच में उसकी ओर से आने वाले भड़ाकाऊ बयान कई बार हालात को फिर वहीं ला खड़ा करते दिखते हैं। माना जा रहा है कि भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत को स्वीकारने के बाद जिनपिंग के नेतृत्व में भारत के प्रति चीन की नीति में बदलाव देखने को मिलेगा।

यूं ही नहीं की टाटा की तारीफ
कारोबार जगत में भारत की बढ़ती साख को चीन द्वारा स्वीकार करने की एक झलक उस वक्त देखने को मिली जब बीते दिनों  चीन ने भारतीय उद्योगपति रतन टाटा की सराहना करते हुए कहा कि रतन टाटा एशिया के दोनों प्रमुख देशों के बीच बेहतर संबंध बनाने में सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं। भारत-चीन युद्ध के 50 साल पूरे होने के अवसर पर शांगहाए के एक अखबार ‘लिबरेशन डेली’ ने भारत-चीनी गठजोड़ को मजबूत करने के संबंध में टाटा की भूमिका का विस्तार से उल्लेख किया।

अखबार ने टाटा समूह के अध्यक्ष के उन बयानों का जिक्र किया,  जिनमें उन्होंने भारत और चीनी कंपनियों के बीच मजबूत गठजोड़ की वकालत की है। टाटा ने कहा था कि भारत को चीन की बढ़ती आर्थिक ताकत से परेशान नहीं होना चाहिए, बल्कि चीन के साथ संबंध मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। टाटा की इस बात का समर्थन करते हुए चीनी अखबार ने कहा था कि दुनिया की दो बड़ी ताकतों भारत और चीन के बीच ऐसे संबंध होने चाहिए जैसे दो सहयोगियों के बीच होते हैं।

चीन की आर्थिक स्थिति
:- 2009 में चीन की विकास दर लगभग 12 प्रतिशत थी जो गिरकर वर्तमान में 7.4 प्रतिशत रह गया है।
:- यूरोपीय संघ व अमेरिकी बाजारों में आई गिरावट के चलते चीन का निर्यात भी प्रभावित हुआ है।
:- 2005 में चीनी अर्थव्यवस्था में सरकारी क्षेत्र के मुकाबले निजी क्षेत्रफल की भागीदारी बढ़ी, वहीं 2011 तक चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में कामयाब रहा।
:- वर्तमान में 7.3 अरब डॉलर चीन की जीडीपी है।
:- 2015 तक चीन अपनी आबादी एक अरब 39 करोड़ के निर्धारित दायरे के भीतर रखेगा।
:- 2015 तक अपने अंतरिक्ष विस्तार कार्यक्रम के तहत चीन की 100 रॉकेट और 100 उपग्रह भेजने की योजना है।
:- आर्थिक मंदी के दौर में गुजर रहे चीन ने अपने जीडीपी वृद्धि दर के अनुपात को घटाकर 7.5 कर दिया है जो पिछले साल 8 फीसदी थी।
:- 1978 में चीन की वैश्विक कारोबार में चीन की हिस्सेदारी मात्र एक फीसदी थी।
:- 2010 में आर्थिक वृद्धि दर 10.3 प्रतिशत थी।
:- 2001 से 2007 के बीच बुश प्रशासन ने पाक को परमाणु प्रोद्योगिकी देरे के मामले में चीनी कंपनियों पर लगाए प्रतिबंध।
:- 2009 में ओबामा प्रशासन ने विश्व में मिसाइल प्रौद्योगिकी के प्रसार के लिए चीनी कंपनियों पर छह बार प्रतिबंध लगाए।
:- 2011 में चीन का कुल रक्षा व्यय जीडीपी का मात्र 1.28 था, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन व अन्य का यह अनुपात दो प्रतिशत से ज्यादा है।
:- 2011 में सैन्य बजट वाले शीर्ष देशों में अमेरिका-739.3, चीन-106, ब्रिटेन-63.7, रूस-52.7 और भारत 36.28 अरब डॉलर था।
:- चीन जी-20 का सदस्य है और उसकी प्रतिस्पर्धा अमरीका से है।
:- चीन में 80 के दशक में औसत उम्र 22 साल थी अब वह बढ़कर 35 हो गई है।

भारत का चीन से व्यापार
वर्ष ----- आयात ----- निर्यात ----- कुल व्यापार ----- व्यापार संतुलन
2006-07 ----- 79,008.61 ----- 37,592.78 ----- 1,16,538.39 ----- -41,478.83
2010-11 ----- 1,98,079.08 ----- 88,932.60 ----- 2,87,011.68 ----- -1,09,146.47
(आंकड़े करोड़ रुपये में)
(टेबल स्रोत: केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय)
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