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जड़ता टूटने से जगी विकास में तेजी की आस

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इंटरव्‍यू अमर उजाला

Updated Fri, 21 Dec 2012 12:26 AM IST
growth accelerated breakdown of inertia around
उद्योग संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कामर्र्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) के 85 साल के इतिहास में नैना लाल किदवई पहली महिला हैं जो इसकी अध्यक्ष बनी हैं। किदवई ने 2012-13 के लिए अध्यक्ष पद संभाला है। ब्रिटिश बैंक एचएसबीसी की भारत में प्रमुख नैना लाल किदवई ने देश की ताजा आर्थिक स्थिति, सरकार द्वारा उठाए गए सुधारवादी कदमों और हाल में लोकसभा में पारित बैंकिंग और कंपनी विधेयकों सहित तमाम मुद्दों पर अमर उजाला के सीनियर एडिटर हरवीर सिंह और प्रिंसिपल कॉरोस्पोंडेंट प्रशांत श्रीवास्तव के साथ लंबी बातचीत की। पेश है इस बातचीत के प्रमुख अंश -
सवाल- ज्यादातर लोगों का मानना है कि घरेलू अर्र्थव्यवस्था में सुधार के लक्षण नजर आने लगे हैं और अब विकास दर में बढ़ोतरी का माहौल बन रहा है। फिक्की अध्यक्ष के नाते इस बारे में आपका क्या कहना है?
जवाब- मैं इसे आशावादी नजरिए से देखती हूं। माहौल बदल रहा है यह ज्यादा आशावादी हो रहा है। कंपनियां मान रही हैं कि सरकार कदम उठा रही है। रिटेल में एफडीआई और कई विधेयकों पर जिस तरह से अब काम हुआ है। हालांकि संसद में इस पर देरी से तालमेल हुआ लेकिन इससे उद्योग जगत मान रहा है कि सरकार अब कई तरह के नियमों के मामले में ठहराव को खत्म कर रही है। इंडस्ट्री को लग रहा है कि अब बात आगे बढ़ेगी। रिटेल एफडीआई, बैंकिंग बिल, कंपनी बिल के पारित होने से माहौल आशावादी हुआ है। अब इससे आगे बढ़ने की जरूरत है, कुछ रेगुलेटरी मुद्दों को अभी हल किए जाने की आवश्यकता है। हमारे सामने अभी भी चुनौतियां हैं।

सवाल-
आपने कहा है कि अभी भी ऐसी कई चुनौतियां हैं जहां कि पहल करने की जरूरत है?
जवाब- सबसे बड़ा मुद्दा इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र, पावर सेक्टर है। यहां चीजें ठहर सी गई हैं। पावर सेक्टर में कोल लिंकेज और कीमत तय करने संबंधी मुद्दे हैं, जिनको हल किए बिना आगे बढ़ना मुश्किल है। इसके अलावा, बिजली वितरण जैसे राज्यों के मुद्दे हैं। पावर प्रोजेक्ट अटकने से पूरी बैंकिंग प्रणाली जोखिम में आ गई है। कर्ज भुगतान आदि की समस्या आ गई है। ऐसे में कैबिनेट कमेटी ऑन इनवेस्टमेंट का गठन एक अच्छा कदम है। इसके स्तर पर मामले सुलझेंगे और नतीजे दिखेंगे। अभी पहले अटके प्रोजेक्ट (ब्राउनफिल्ड) को पूरा करने की जरूरत है। अगर चालू प्रोजेक्ट पूरे होते हैं तो अगले दो तीन साल में कम से कम भारत पावर न्यूट्रल देश बन जाएगा, पावर सरप्लस भलेे ही न बने। अगर ऐसा नहीं होगा तो बैंकों का पैसा फंस जाएगा और हम रिजर्र्व बैंक से ब्याज दरें कम करने की बात करते रहेंगे। लेकिन जब तक एनपीए बढ़ेंगे तो ब्याज दरें कम नहीं होंगी। इंफ्रास्ट्रक्चर की खस्ता हालत उद्योगों के विकास को प्रभावित कर रहा है। उद्योग को पोर्र्ट, रोड और जमीन चाहिए। इन मुुद्दों को हल करने की जरूरत है। उद्योग को रेगुलेटरी और करों के मोर्र्चे पर स्पष्टता चाहिए। सुस्ती के दौर में भी ऑटो सेक्टर, कंज्यूमर ड्यरेबल सेक्टर 20 फीसदी की ग्रोथ हासिल कर रहे हैं। सर्विस सेक्टर भी तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में निवेश की समस्या नहीं है। भरोसा बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए टेलीकॉम, पॉवर, इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को पहली प्राथमिकता में रखना होगा। इसलिए निवेश को समस्या नहीं लेकिन निवेश के पहले उद्योग को एक नीतियों और नियमन के मोर्चे पर साफ तसवीर चाहिए।

सवाल- गुड्स एंड सर्विसेज (जीएसटी) को लेकर हाल ही में जीएसटी पैनल के प्रमुख सुशील मोदी का कहना है कि इसे अगले वित्तीय वर्ष में भी लागू करना मुश्किल है। इसे देखते हुए फिक्की के रूप में आप के क्या प्रयास होंगे?
जवाब- जीएसटी सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए फायदेमंद है। जीएसटी लागू करने में देरी से कोई लाभ नहीं है। यदि यह लागू होता है तो इससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब दो फीसदी की बढ़ोतरी होगी। इसका फायदा सभी को मिलेगा। किसी भी पार्टी की सरकार का अगर कर संग्रह बढ़ेगा, तो उसके पास जरूरी क्षेत्रों में खर्च के लिए ज्यादा पैसा होगा। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक पड़ेगा। साथ ही निवेश में भी तेजी आएगी। फिक्की का प्रयास होगा कि हम इसके लिए सहमति का माहौल बना सके।

सवाल- महंगाई अभी भी ऊंचे स्तर पर है, जिसकी वजह से आरबीआई भी ब्याज दरों में कटौती नहीं कर रहा है?
जवाब- महंगाई कम करना एक प्रमुख चुनौती है। हालांकि नवंबर में कुछ कमी आई है, फिर भी यह एक चिंता का विषय है। खासतौर से खाद्य महंगाई दर अभी भी काफी ऊंची है। महंगाई में कमी न आने की प्रमुख वजह वितरण और आपूर्ति की बेहतर प्रणाली नहीं होना है। आप कहीं भी चले जाइए एक राज्य से दूसरे राज्य में सामान की आवाजाही एक बड़ी समस्या है। ट्रकों की लंबी लाइन दिखेगी और इसमें खाद्य उत्पादों का ज्यादा नुकसान होता है। कोल्ड चेन नहीं है, बेहतर भंडारण नहीं है। खाद्य महंगाई उत्पादन की वजह से नहीं बल्कि लोगों तक ठीक से उत्पादों के नहीं पहुंचने के कारण है। इसे हल करने की जरूरत है। जिसे उद्योग और सरकार को मिलकर हल करना होगा।

सवाल- जहां तक इंडस्ट्री की बात है तो भारत की प्रमुख रिटेल कंपनियों ने सप्लाई चेन को विकसित करने के लिए खास कदम नहीं उठाए हैं। ऐसे में रिटेल में एफडीआई से यह कैसे हल होगा?
जवाब- आपने सही सवाल उठाया है। फिक्की के एजीएम में प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि रिटेल में एफडीआई की आलोचना रिटेल में एफडीआई की नहीं बल्कि बिग बॉक्स रिटेल की है। मुद्दा बड़ी रिटेल की एंट्री का है, यह घरेलूू होगा कि विदेशी बात यह है। हमारे बड़े ग्रुप जो इसमें आए हैं उनको इसका अनुभव नहीं है। फिक्की की अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार देश में रिटेल कारोबार में बड़ी विदेशी कंपनियों के आने से 80 अरब डॉलर की बढ़ोतरी होगी। इसमें से 80 फीसदी घरेलू कारोबारियों के हिस्से आएगा। बाजार बढ़ेगा इसमें केवल हिस्से की बात है। लेकिन यह भी तय है कि विदेशी बड़ी रिटेल कंपनियों को भी भारत के बाजार और ग्राहक के मुताबिक अपने बिजनेस मॉडल को बदलना होगा। थाईलैंड, मलयेशिया, फिलीपींस में जिस तरह किसानों को फायदा हुआ है, वैसा यहां भी मिलेगा। भारत में किसानों के और मजबूत संगठनों की जरूरत है। लेकिन जहां भी उद्योग ने किसानों के साथ सीधे काम किया उसका फायदा दोनों को मिला। जीरा उत्पादन के मामले में आईटीसी की पहल इसका उदाहरण है। इसी तरह, महाराष्ट्र से यूरोप के बाजार में जा रहे खास किस्म के अंगूर एक कामयाब उदाहरण है। डेनमार्र्क के सुपर मार्केट में इनको देखकर मुझे गर्व हुआ। लेकिन जब मैक्डोनॉल्ड के आलू की जरूरत का मसला हो या किसी दूसरी कंपनी का यह उनकी जरूरत पर निर्भर करता है। बेहतर विधियों की कमी के चलते हम फल और सब्जियों के बड़े निर्यातक नहीं बन सके हैं, जो एक बड़ी संभावना है।  

सवाल- हाल ही में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने जीडीपी दर अगले साल छह फीसदी से ज्यादा रहने की उम्मीद जताई है?
जवाब- इस साल छह फीसदी से कम विकास दर रहती है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसमें तेजी के लिए सरकार को बड़े सुधार करने होंगे। हाल ही में उठाए गए सुधार के कदम और कुछ बड़ी चुनौतियों को अगर सरकार हल करती है, तो निश्चित तौर पर हम चालू योजना के लिए तय 8.2 फीसदी की विकास दर के लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं। निवेश के लिए पैसा समस्या नहीं है बल्कि भरोसा पैदा करना सबसे अहम है। सवाल पैसे का नहीं कांफिडेंस का है।

सवाल - ब्याज दरें ऊंची रहने का निवेश पर कितना असर पड़ा है? आने वाले दिनों में ब्याज दरों के रुख की क्या संभावना है?
जवाब- देखिए, भारत में हमेशा से ऊंची ब्याज दरों का दौर रहा है। ब्याज दरों से ज्यादा जरूरी है कि सरकार विकास का माहौल बनाए। रेगुलेटरी स्तर पर अड़चनों को दूर करे। यदि ऐसा होता है तो निवेश का माहौल बनेगा। जहां तक ब्याज दरों के रुख की बात है तो मेरा मानना है कि उसमें कमी आनी चाहिए, मुझे उम्मीद है कि इसमें कमी आएगी। अप्रैल से जून की तिमाही तक आधा फीसदी तक की कमी आ सकती है।

सवाल -
सरकार द्वारा बैंकिंग बिल और कंपनी बिल के पारित करने से आप किस तरह के बदलाव देखती हैं?
जवाब - नए बैंकिंग कानून के लागू होने से निश्चित तौर पर बैंकिंग सेवाओं का विस्तार होगा। रिजर्व बैंक नए बैंक लाइसेंस दे सकेगा। देश को ज्यादा बैंकिंग की जरूरत है ज्यादा बैंकों की नहीं। यह नए लाइसेंस और बैंकों के कंसोलिडेशन से संभव है। बैंकों को बेसल-3 मानक भी लागू करना है उसके लिए भी पूंजी की जरूरत है। ऐसे में अभी भी देश के  सार्वजनिक बैंकों में 70 फीसदी अधिकार भारत सरकार का है। सरकार को इससे बाहर आना होगा ताकि वह इस पूंजी को कहीं और बेहतर काम पर लगा सकें। इसी तरह, नए कंपनी कानून की काफी समय से जरूरत थी। यह गवर्नेंस सहित मोर्चों पर बेहतर प्रावधान लेकर आया है। कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसबिलटी के प्रावधान इंडस्ट्री के लिए चुनौतीपूर्ण हैं।


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