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अर्थशास्त्री नेतृत्व से नहीं संभल रही अर्थव्यवस्था

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नई दिल्ली (यशवंत सिन्हा का साक्षात्कार)

Updated Tue, 04 Dec 2012 12:07 AM IST
economist leadership can not lead economy
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ सांसद और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा का कहना है कि इस समय देश की आर्थिक स्थिति बहुत ही चिंताजनक है। अगर सरकार घाटे और महंगाई पर अंकुश नहीं लगा पाई तो संकट और बढ़ेगा। उनका कहना है कि अर्थशास्त्रियों की कांग्रेस सरकार आर्थिक मोर्र्चे पर पूरी तरह भटक गई है। असल में कांग्रेस ने हमेशा आपूर्र्ति में कमी पर आधारित अर्र्थव्यवस्था चलाई है और इसलिए सरप्लस की अर्थव्यवस्था चलाने का उसके पास अनुभव ही नहीं है। जबकि हमने राजग की अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में निवेश और मांग दोनों के लिए बेहतर माहौल बनाकर विकास दर को दस फीसदी तक पहुंचाने की जमीन तैयार की थी। अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम मुद्दों और पहलुओं पर यशवंत सिन्हा ने अमर उजाला के सीनियर एडिटर हरवीर सिंह के साथ लंबी बातचीत की। पेश इस बातचीत के मुख्य अंश-
अभी देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति के बारे में आप क्या कहेंगे?
- अत्यंत चिंताजनक है, अगर किसी दूसरी सरकार में यह स्थिति होती तो कांग्रेस पार्टी ने उसे गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ी होती। केंद्रीय समस्या है सरकार का बेहिसाब घाटा और उसकी शुरुआत 2008-09 केबजट से शुुरू हुई और उस साल यह बजट अनुमान से दो लाख करोड़ रुपये बढ़ गया था। उस समय से जो घाटा बढ़ा वह रुकने का नाम नहीं ले रहा है। महंगाई के खिलाफ लड़ाई में रिजर्व बैंक ब्याज कम नहीं करेगा। ऐसे में मांग के बावजूद निवेश नहीं हो रहा है क्योंकि निवेश की लागत बढ़ गई है। नतीजतन हमारी विकास दर घटती जा रही है। अर्र्थशास्त्रियों की यह सरकार स्थिति की समीक्षा उस तरह नहीं कर रही है जिस तरह से मैंने की थी। हम एक दुश्चक्र में फंस गए हैं। इसे तोड़ने की जरूरत है। इसे हमने वाजपेयी सरकार के समय में तोड़ा था। चिदंबरम ने 2004 में जब पहली आर्र्थिक समीक्षा पेश की थी तो उन्होंने माना कि हमारे समय में महंगाई में ढांचागत बदलाव हुआ और इसमें कमी आई। इनका कहना था कि हमारी चुनौती तेज विकास दर को बनाए रखना है और यहीं पर वह मार खा गए। असल में कांग्रेस के पास इकोनॉमी ऑफ शॉर्टेज को मैनेज करने का अनुभव है। हम इकोनॉमी ऑफ सरप्लस बनाकर गए थे, जिसका इनको अनुभव ही नहीं है।

हालात सुधारने के उपाय क्या हैं?
सबसे पहले सरकारी घाटे को कम करना है। महंगाई को कम करना है। खाद्य महंगाई दर सभी क्षेत्रों को प्रभावित करती है। सबसे पहले इस पर अंकुश  लगाने की जरूरत है। हमने संसद में सरकार को सुझाव दिए हैं, क्योंकि हम इस अनुभव से गुजर चुके हैं। आप अनाज रखे हुए हैं और दाम बढ़ गए। सरकार ने पिछले दिनों डीजल पर पांच रुपये लीटर के जो दाम बढ़ाये वह खतरनाक कदम था। पहले महंगाई काबू करो तो रिजर्व बैंक से ब्याज दरें घटाने के लिए कहा जा सकता है। इससे निवेश का चक्र शुरू होगा।

सरकार ने हाल ही में सुधारों के नाम पर बहुत सारे फैसले किए हैं?
असल में इसके पीछे प्रधानमंत्री की विदेशी समाचार माध्यमों में हो रही आलोचना एक बड़ा कारण रही है। उससे वह तिलमिला गए और सोचा कि कुछ किया जाए जिससे विदेशी खुश हों। अगर देश में सड़क बनाते या टेलीकॉम में सुधार करते तो उससे यह संदेश नहीं जाता। घरेलू मीडिया से उन पर असर नहीं पड़ता है। बीमा, बैंक, पेंशन और रिटेल में एफडीआई से जुड़े यह फैसले सब कुछ विदेशियों को ध्यान में रखकर ही किए गए हैं। इन सब फैसलों में विदेशियों के लिए संदेश था।

लेकिन इनमें से कई क्षेत्रों में तो शुरुआत भाजपा ने की थी?
पीएफआरडीए के हम पक्ष में हैं और संसदीय समिति में हमने रिपोर्र्ट तैयार कर विधेयक को पेश करने के लिए कहा। इसे संसद में पेश करने के लिए जब राज्य मंत्री लेकर आए, तो वाम दलों ने मत विभाजन मांग लिया था और उस समय हमने समर्थन देकर इसको पेश कराया। पेंशन में हम 26 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा चाहते हैं और इसे हम विधेयक का हिस्सा बनाना चाहते हैं, ताकि इसे बीमा से जोड़कर बदला न जा सके। हम एक्जीक्यूटिव को एफडीआई अधिकार नहीं देना चाहते है। साथ ही हम इसमें एश्योर्र्ड रिटर्न का प्रावधान करना चाहते हैं। हम बीमा और पेंशन में 26 फीसदी की एफडीआई सीमा को बिल में रखना चाहते हैं। जबकि बैंकिंग में वोटिंग अधिकार की सीमा को 26 फीसदी पर ही रखना चाहते हैं। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट और आज यूूरोप के संकट को देखते हए वित्तीय क्षेत्र में जोखिम लेने की जरूरत नहीं है। अभी 26 फीसदी रखो बाद में धीरे धीरे आगे बढ़ सकते हैं। अगर वह हमारी बात मान लेते हैं तो हम बिलों का समर्थन करेंगे।

रिटेल क्षेत्र में एफडीआई क्या फायदेमंद साबित होगा?
इससे कुछ फायदा नहीं होगा। फूड प्रोसेसिंग में पहले से 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति है। बैकएंड ऑपरेशन में 100 फीसदी की अनुमति है। जब दुकानें खुलेंगी तभी बैकएंड में निवेश होगा, नहीं तो नहीं होगा। यह तो कोई तर्क नहीं है। लेकिन हल क्या है? कृषि कारोबार को तो संगठित करना ही है। कृषि उत्पादों के कारोबार में सबसे अहम कृषि उत्पाद मार्र्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट है। उस पर राज्यों से बात क्यों नहीं करते हैं। हमने भी इसकी शुरुआत की थी। पहले जमीनी स्थिति ठीक करें फिर ऊपर की ओर जाएं।

कर सुधारों के बारे में आपका क्या कहना है, आपके वित्त मंत्री रहते कर सुधारों पर काफी काम हुआ था?
- मैं आप से एक बात कहता हू्ं। चाहे जीएसटी ले लीजिये या डीटीसी ले लीजिये। डीटीसी पर हमने 9 मार्च को संसदीय समिति की सिफारिश सरकार को सौंप दी थी। बजट के एक सप्ताह पहले, लेकिन रिपोर्ट पर विचार किए बना गार का विवादास्पद अध्याय जोड़ दिया और फंस गए। पहले प्रणब मुखर्जी ने इसे एक साल टालने की बात कही। उसके बाद प्रधानमंत्री ने कुछ नियमों को बदल दिया। फिर चिदंबरम आए, तो उन्होंने पार्र्थसारथी शोम कमेटी बना दी। अब चिदंबरम ने जीएसटी पर दो समितियां बना दी, उनकी रिपोर्ट दिसंबर अंत में आनी है। माना यह जाता है कि सोच पूरी होने बाद ही संसद में सरकार कानून लाती है। लेकिन जीएसटी पर पुनर्विचार, डीटीसी पर पुनर्विचार, कंपनी कानून और भू अधिग्रहण विधेयक पर पुनर्विचार। हर चीज पर अगर आप पुनर्विचार करेंगे तो क्या होगा? जिस यूआईडीएआई के जरिये सरकार कैश सब्सिडी ट्रांसफर करना चाहती है उसके विधेयक को संसद ने डेढ़ साल पहले लौटा दिया था उसकी कोई कानूनी वैधता नहीं है और उसके जरिये इतना बड़ा कार्यक्रम लागू किया जा रहा है।

आपको लगता है कि कैश ट्रांसफर योजना व्यवहारिक रूप से लागू हो सकती है?
बिना बैकबोन तैयार किए यह कामयाब नहीं हो सकता है। हम इसे व्यावहारिक नहीं मानते हैं। सब्सिडी के लिए बीपीएल कार्ड की जरूरत पड़ेगी। वहीं कई राज्यों की अपनी राशन व्यवस्था है वह कैसे इसके साथ समायोजित होगी। हम इसका विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन पहले व्यवस्था पूरी तरह से चुस्त दुरुस्त करो नहीं तो भारी संकट होगा।

भ्रष्टाचार को लेकर आप क्या सोचते हैं। अब घोटालों का आकार लाखों करोड़ में जा रहा है?
पैसा बनाने का लालच लोगों को हमेशा रहता है और सरकार का यह काम है कि वह इसे रोके। पहले लाइसेंस परमिट का फायदा उठाया जाता था। लाइसेंस, परमिट, कोटा राज खत्म होने केबाद क्या करें तो लोगों का ध्यान नेचुरल रिसोर्सेज की तरफ गया, कोयला, स्पेक्ट्रम, आयरन ओर। इन सबमें घोटाला हुआ और अब पानी के निजीकरण की बात हो रही है। नेचुरल रिसोर्स में पैसा बनाना और इसका पैमाना ही इतना बड़ा है कि इसमें भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर ही होगा और यही हम देख रहे हैं। इसे रोकने के लिए सरकार ने कुुछ नहीं किया तो जिसे जहां मौका मिल रहा है वह दांव मार रहा है।

काले धन पर आप क्या कहेंगे?
भारत काले धन का बड़ा विक्टिम रहा है। अंतरराष्ट्रीय सोच में बदलाव हमारे लिए सुुनहरा मौका है। जैसे अमेरिका ने स्विट्जरलैंड पर दबाव बनाकर जानकारी मांगी वैसे ही हमें भी ऐसे सभी देशों पर दबाव बनाकर जानकारी मांगनी चाहिए। हमारे पास फेमा और मनी लांड्रिंग जैसे कानून हैं उन्हें ठीक से लागू करना चाहिए।

मौजूदा राजनीतिक हालात में क्या चुुनाव समय से होंगे?
चुनाव समय पर होगा। मैं उन लोगों में नहीं हूं जो बिना आधार के कयास लगाते हैं। जो लोग सरकार में रहकर इतना फायदा उठा रहे हैं वह एक भी दिन नहीं गंवाना चाहते हैं। अर्थशास्त्रियों की सरकार ने अर्थव्यवस्था का क्या हाल कर दिया है। हमारे प्रधानमंत्री विश्व गुुरु हैं जो ओबामा को भी अर्थशास्त्र सिखाते हैं। लेकिन सचाई हम सबके सामने है। जबकि वाजपेयी जी अर्थशास्त्री नहीं थे, लेकिन उनके नेतृत्व में हमने अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई पर पहुंचाया था।
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