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आपकी गाढ़ी कमाई ‘लूट’ रहीं मोबाइल कंपनियां

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Updated Sun, 17 Jun 2012 12:00 PM IST
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मोबाइल सेवा कंपनियों की नजर में आम आदमी की गाढ़ी कमाई की कोई कीमत नहीं है। कभी रिंगटोन, कभी किसी मॉडल की हॉट तसवीर तो कभी मस्त चुटकुलों के नाम पर मोबाइल कंपनियां अपनी मर्जी से आपको वैल्यू एडेड सर्विस देती हैं और अपनी मर्जी से ही आपका पैसा काट लेती हैं।
तमाम शिकायतों और कदमों के बावजूद कंपनियां सुधर नहीं रही हैं। दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) भी कंपनियों की इस खुलेआम लूट पर लगाम लगाने में असमर्थ है। ट्राई को पिछले साल इस तरह की लगभग 73 लाख से ज्यादा शिकायतें मिली थीं।

वैसे जानकार बताते हैं कि असल में यह आंकड़ा बहुत ज्यादा है, क्योंकि कुछ ही लोग ट्राई तक पहुंच पाते हैं। ऐसा भी नहीं कि ट्राई ने इसकी सुध नहीं ली है। पिछले साल ही ट्राई ने आदेश जारी किया था, जिसके तहत ऑपरेटरों को कहा गया था कि सेवा देने से पहले कंपनियों को पहले ग्राहकों से एसएमएस, ई-मेल या फैक्स के तौर पर लिखित पुष्टि लेनी पड़ेगी। साथ ही सेवा की समय सीमा खत्म होने के बाद ग्राहकों से कंपनियों को इसे दुबारा लेने के लिए भी पुष्टि करनी पड़ेगी।

आदेश जारी होने के एक साल बाद भी कंपनियां इसे अपनाने में कोताही बरत रही हैं। दरअसल, कंपनियां इन निर्देशों पर अमल करना नहीं चाहती, क्योंकि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि कंपनियों के कुल मुनाफे के 20 फीसदी हिस्सा उसे इस तरह की सेवाओं के जरिए आता है। दूरसंचार विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर ट्राई के निर्देशों के तहत कंपनियां ग्राहकों की मंजूरी लेना शुरू कर दें तो उनका यह गोरखधंधा घटकर आधा हो जाएगा।

रिंगटोन, वॉलपेपर और मस्त चुटकुलों जैसी वैल्यू एडेड सेवाएं ग्राहकों के बीच छोटे शहरों में बहुत पसंद की जाती हैं। वहां अज्ञानता के कारण भी ग्राहक कंपनियों की चाल में फंस जाते हैं। वहीं ग्राहकों के साथ कंपनियों के इस मनमाने रवैये का एक और पहलू भी है।

कंपनियों ने अपनी वैल्यू एडेड सेवाओं का काम दूसरी एजेंसियों को आउटसोर्स कर रखा है। यानी कि ग्राहकों को रिंगटोन, एसएमएस पैकेज या किसी अन्य सेवा देने का काम बाकायदा एजेंसियों का कॉल सेंटर नेटवर्क करता है।

दूरसंचार विशेषज्ञ सुधीर उपाध्याय कहते हैं कि कंपनियों और आउटसोर्स एजेंसियों के बीच बाकायदा करार होता है, जिसके तहत जितनी ज्यादा सेवा ग्राहकों को बेची जाती है, उतनी ज्यादा रकम कंपनियों की ओर से एजेंसियों को देनी पड़ती है। ऐसे करार के चक्कर में ही एजेंसियों ज्यादा मुनाफा कमाने की लालच में ग्राहकों की बिना मर्जी के सेवा थोपती हैं।

अभी पिछले ही साल ट्राई ने इस तरह कई एजेंसियों पर रोक लगाई थी। मगर बाद में पता चला कि इसमें से कई एजेंसियां नाम बदलकर दुबारा इस कारोबार में जुट गईं। मोबाइल कंपनियां ट्राई को कह रही हैं कि वह अब ऐसी सेवा देने के पूरे तंत्र को बदलने के लिए तैयार है, लेकिन ऐसा करने में कुछ समय लगेगा। वहीं ट्राई का कहना है कि नए तंत्र की जरूरत नहीं है।

अगर कंपनियां ट्राई के निर्देशों पर अमल करना शुरू कर दें तो अलग से तंत्र स्थापित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कंपनियों और ट्राई की यह बहस लंबी चलेगी, लेकिन इस चक्कर में ग्राहक की जेब लूट रही है।
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