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सरकारी नियंत्रण में होंगी 348 दवाएं, मंत्रियों के समूह ने लिया फैसला

नई दिल्ली/ब्यूरो

Updated Fri, 28 Sep 2012 01:59 AM IST
348 drugs will be in govt control
मंत्रियों के समूह (जीओएम) ने 348 दवाओं और 615 दवा फार्मूलों को सरकारी नियंत्रण में लाने का फैसला किया है। गुरुवार को कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता में हुई जीओएम की बैठक में दवा मूल्य निर्धारण की नीति पर सहमति बन गई है। इन जरूरी दवाओं के दाम अब बाजार में एक फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी रखने वाली सभी दवा कंपनियों की औसत कीमत के आधार पर निर्धारित होंगे। इससे दवाएं 20 फीसदी तक सस्ती हो सकती हैं। इसके अलावा, आवश्यक दवाओं की कीमतों को थोक मूल्य सूचकांक से जोड़ने का भी प्रस्ताव है।
बैठक के बाद शरद पवार ने कहा कि इस मामले पर जीओएम का निर्णय हो चुका है, जिसे मंजूरी के लिए कैबिनेट के पास भेजा जाएगा। अभी तक सिर्फ 74 दवाएं ही आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) में शामिल थीं, जिनकी कीमतें 1995 के ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर से तय होती थीं। अब इस सूची में 348 दवाओं और 614 दवा फार्मूलों के शामिल होने का रास्ता खुल गया है।

केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक राज्यमंत्री श्रीकांत जेना ने बताया कि 348 आवश्यक दवाओं पर अधिकतम मूल्य सीमा लागू करने होगी। यह सीमा बाजार में एक फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी रखने वाली दवाओं के एवरेज वेटेड प्राइज के आधार पर तय की जाएगी। जेना ने कहा कि इन दवाओं की कीमतें तय करने के  3-4 तरीके जीओएम के सामने आए थे, इनमें से इसी तरीके पर सहमति बनी। जीओएम की सिफारिशें अगले सप्ताह तक कैबिनेट के पास मंजूरी के लिए भेज दी जाएंगी। विभागीय सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री कार्यालय से इस मसले पर फैसला रोकने का दबाव था।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 348 जरूरी दवाओं की कीमतें नियंत्रित करने के लिए सरकार को 27 सितंबर तक का समय दिया था। दवा कंपनियां सबसे ज्यादा बिकने वाले तीन दवा ब्रांड की कीमत को आधार मानने का दबाव बना रही थीं, जबकि स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विभिन्न पक्ष लागत के आधार पर कीमतें तय करने के पक्ष में थे। इसमें सरकार ने बीच का रास्ता निकालते हुए बाजार के सभी प्रमुख ब्रांड के आधार पर आवश्यक दवाओं की कीमत तय करने की नीति अपनाई है।

थोक मूल्य सूचकांक से जुड़ेंगे जरूरी दवाओं के दाम
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, जीओएम ने आवश्यक दवाओं के दाम थोक मूल्य सूचकांक से जोड़ने की भी सिफारिश की है। इससे दवा कीमतों के अत्यधिक बढ़ोतरी पर अंकुश लग सकता है, लेकिन हर साल जरूरी दवाओं के दाम 5 फीसदी बढ़ने भी तय हो जाएंगे।

60 फीसदी दवाएं होंगी सस्ती
348 दवाओं के सरकारी नियंत्रण में आने के बाद बाजार में उपलब्ध 60 फीसदी दवाएं सस्ती हो सकती हैं। सरकार का दावा है कि इससे दवा की कीमतें औसतन 20 फीसदी कम हो जाएंगी। दवा उद्योग के जानकारों का मानना है कि इससे दवा कंपनियों को सालाना करीब 7 हजार करोड़ का घाटा होगा, क्योंकि इन 348 दवाओं की सालाना बिक्री करीब 29 हजार करोड़ है। आर्गनाइजेशन ऑफ फार्मास्यूटिक प्रोड्यूसर्स ऑफ इंडिया के महासचिव तपन रे का कहना है कि इस फैसले का दवा उद्योग पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और मार्जिन कम हो जाएंगे।
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