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अब कल्याण और उमा में आर-पार की जंग

लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी।
Story Update : Thursday, February 23, 2012    12:16 AM
Now welfare and Uma across battle

वक्त कभी-कभी इतिहास को रोचक मोड़ पर ला खड़ा करता है। बुंदेलखंड से गाजियाबाद तक की धरती पर यह बात सोलह आने सच साबित होते दिख रही है। खेमा है भाजपा का। पिछले विधानसभा चुनाव में कल्याण सिंह इस इलाके में उमा भारती की पकड़ व पैठ में फंसे भाजपा के वोटों को निकालकर कमल खिलाने की कोशिश में जुटे थे। इस बार उमा भारती, कल्याण के खिलाफ इस धरती पर वही भूमिका निभाते हुए सक्रिय हैं। तब कल्याण कह रहे थे कि उमा उनकी बेटी जैसी हैं। इसलिए वह अपने पितातुल्य का ख्याल रखेंगी। इस बार उमा यह कहती घूम रही हैं, ‘कल्याण मेरे पिता जैसे हैं। वह बड़े नेता हैं। मैं उनसे अपनी तुलना को ठीक नहीं मानती। पर, विरासत में बेटी अपने बाप से आगे निकलेगी।’

सूबे का सियासी समर तमाम पड़ाव पार करते हुए कल्याण व उमा की सीधी जंग तक आ पहुंचा है। पांचवें द्वार से शुरू हो रही इस जंग से न सिर्फ यह साफ होगा कि सामाजिक समीकरणों में कल्याण ‘बेटी उमा’ पर भारी पड़ते है कि उमा, पितातुल्य कल्याण के कद की कांट-छांट करने में कामयाब रहती हैं। देखना होगा कि यह धरती किसका साथ देगी। पांचवें से सातवें मोरचे की जंग की इस जमीन से यह सच भी सामने आने वाला है कि कल्याण के भाजपा से अलग होने के फैसले पर, उनके समर्थकों और समाज का रुख क्या है? साथ ही यह भी पता चलेगा कि तो उमा के भाजपा में लौटने पर वोटर की क्या सोच है।

तमाम दावों के बावजूद प्रदेश के चुनाव में जातीय समीकरण मुद्दों पर भारी हैं। प्रदेश में लगभग पांच फीसदी लोध मतदाता हैं और लगभग 70 सीटों पर हार-जीत का गणित सेट करते हैं। मोटे तौर पर इनमें 90 प्रतिशत सीटेें बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, गंगा और यमुना की तलहटी की उस जमीन पर हैं, जिस पर अब जंग लड़ी जानी है। उमा व कल्याण दोनों लोध बिरादरी से हैं। लेकिन अतिपिछड़ी जातियों पाल, गड़रिया, तेली, माली, लोहार, नाई, कुम्हार, काछी, मौर्य, तमोली, कहार और मल्लाह मतदाताओं के बीच लगभग समान दखल रखते हैं। दोनों सवर्णों में भी समान रूप से लोकप्रिय हैं। उमा तथा कल्याण जब तक साथ भाजपा में रहे, तो इस धरती पर एक और एक ग्यारह साबित हुए। बुंदेलखंड से अलीगढ़, बुलंदशहर तक कई सीटें भाजपा के पास रहती थीं। पर, बाद में भाजपा व कल्याण फिर भाजपा व उमा की अनबन ने इस इलाके में भाजपा का काफी नुकसान कर डाला।

यही वजह रही कि लोकसभा के 2004 के चुनाव के पहले भाजपा ने कल्याण को वापस लाकर इस नुकसान की भरपाई की कोशिश की। अब कल्याण के दोबारा भाजपा से अलग होने के बाद वह उमा भारती के सहारे पुराने वैभव को पाने की कोशिश कर रही है। हालांकि प्रदेश के लोध बहुल कमालगंज, उमरदा, खागा, फतेहपुर, छिबरामऊ, कन्नौज, बांदा, बबेरू, नरैनी, कर्वी, फर्रुखाबाद व कायमगंज में वोट पड़ चुके हैं। पर, 5 से 15 फीसदी लोध आबादी वाली सिरसागंज, मारहरा, भोगांव, बबीना, हमीरपुर, राठ, महोबा, चरखारी, ललितपुर, मऊरानीपुर, डिबाई, अनूपशहर, स्याना, अतरौली, अलीगढ़, रामपुर, बरेली सिटी, भोजीपुरा, बहेड़ी, बीसलपुर, पूरनपुर, पुवायां, शाहजहांपुर, चंदौसी, कुंदरकी, मुरादाबाद देहात, स्वारटांडा, विलासपुर, शाहबाद, सुनहा, पुरकाजी जैसी लगभग 50 सीटों पर अभी वोट पड़ने बाकी हैं। इन सीटों पर भाजपा के पक्ष अथवा विपक्ष में पड़ने वाले वोट इन दोनों नेताओं की कद-काठी तय करेंगे।



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