बुंदेलखंड की सरजमीं कई नायकों की कर्मभूमि रही है। इन नायकों की पूरी दुनिया में मिसाल दी जाती है। उन्हें लोग अपना आदर्श बनाने की बातें करते हैं, उनका यशोगान भी किया जाता है, मगर चुनाव के मौसम में कोई भी राजनीतिक दल उनकी चर्चा तक नहीं करता।
स्कूली शिक्षा में जिन नायकों की चर्चा होती है, उनमें से महान योद्धा आल्ला-ऊदल से लेकर महारानी लक्ष्मी बाई तक ने अपनी कर्मभूमि बुंदेलखंड को बनाया था। हाकी के जादूगर ध्यानचंद का भी नाता यहीं से है। इतना ही नहीं, कवि ईसुरी, राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त और वृंदावन लाल वर्मा जैसे कलमकार यहीं हुए हैं, जिन्होंने बुंदेलखंड को दुनिया में पहचान दिलाई है।
बुंदेलखंड को भले ही इन नायकों के कारण पहचान मिली हो, लेकिन राजनीतिक दलों को इनसे कोई लेना-देना नहीं है, यही कारण है कि स्थानीय से लेकर लोकसभा तक के चुनाव में कोई भी राजनीतिक दल इनकी चर्चा तक नहीं करता।
उत्तर प्रदेश में हो रहे विधानसभा चुनाव में भी पिछले चुनाव जैसा ही हाल है। दलों को लगता है कि नायकों की चर्चा से न तो उन्हें वोट मिलने की उम्मीद है और न ही मंच पर मौजूद नेता के खुश होने की गारंटी है। ऐसे में इन नायकों की चर्चा करें भी तो क्यों।
बुंदेलखंड क्षेत्र में विधानसभा की 19 सीटें हैं, पिछले चुनाव में इनमें से 15 पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और दो-दो पर कांग्रेस व समाजवादी पार्टी (सपा) ने जीत दर्ज की थी। इस बार भी इन तीनों दलों के अलावा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच जोर-आजमाइश चल रही है। सभी दलों के दिग्गज नेता क्षेत्र का दौरा कर अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। एक-दो मौकों को छोड़ दिया जाए तो किसी भी नेता ने इस इलाके के नायकों की चर्चा तक करना मुनासिब नहीं समझा है।
बुंदेलखंड में राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्र में बराबर का दखल रखने वाले हरगोविंद कुशवाहा कहते हैं, ‘वर्तमान पीढ़ी विज्ञान और इंटरनेट वाली है, लिहाजा उसकी इतिहास और साहित्य पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। जिन्होंने ईसुरी, गुप्त और वर्मा को पढ़ा ही नहीं है तो उनसे यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे बुंदेलखंड के नायकों की चर्चा करेंगे।’
कुशवाहा कहते हैं कि झांसी में आया नेता जरूर लक्ष्मीबाई और मैथिली शरण गुप्त की चर्चा कर जाता है, ऐसा इसलिए क्योंकि झांसी का नाम जुबान पर आते ही लक्ष्मीबाई याद जो आ जाती हैं। बाकी नायकों की तो कोई चर्चा करना मुनासिब नहीं समझता। वे भी मानते हैं कि चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके अपनाते हैं, मगर नायक किसी को याद नहीं आते।
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