आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Vishwa Kavya ›   famous poem of Leonid Mateenf
famous poem of Leonid Mateenf

विश्व काव्य

लियानीद मर्तीनफ़: सब बस्तियां सब सड़कें, डूब चुकी थीं बर्फ़ के भीतर

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

127 Views
कवि लियानीद मर्तीनफ़ का जन्म 22 मई 1905 को रूस के ओम्स्क शहर में हुआ था। मर्तीनफ़ का उपनाम लियानीद निकलाएविच मर्तीनफ़ था। उन्हें कई सम्मानों से भी नवाज़़ा गया। इसमें रूसी गणतंत्र द्वारा दिया गया गोर्की पुरस्कार और सोवियत संघ के राजकीय पुरस्कार प्रमुख हैं। 21 जून 1980 को मर्तीनफ़ ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

निर्वस्त्र यात्री 

मुझे मालूम है यह आकाश
फिर से प्राप्‍त कर लेगा नीलापन
बैठ जाएगा यह ठण्डा झाग
पूँछ उठाता उड़ जाएगा यह धुआँ ।

सब बस्तियां, सब सड़कें
डूब चुकी थीं बर्फ़ के भीतर

तभी पैदा हुई अफ़वाहें
निर्वस्‍त्र टहलते उस प्रेत के बारे में ।
प्रकट हुआ वह सबसे पहले
प्राचीन भवनों के अवशेषों में
फिर निर्दोष हृदयों में भय फैलाने के लिए
तेज़ किए उसने खाली जगहों में अपने क़दम ।
जिनके भी सामने वह प्रकट हुआ
सबने क़सम खाते हुए कहा --
कोई उद्देश्‍य नहीं था
नंगे सिर निर्वस्‍त्र टहलते उस प्रेत का ।

हमारी भी भेंट हुई है उससे ।
सहमत होंगे आप भी
उसके-जैसी भयावह नग्‍नता
किसी ने नहीं देखी आज तक ।

कौन है वह ? युद्ध के वर्षों की निर्मम धरोहर
जब शत्रु सैनिक सर्दियों में क़ैदियों के उतरवा देते थे कपड़े
और कहते थे =- 'भाग जा !'
सम्भव है यह कोई पागल स्‍वाभिमानी हो
प्रकृति के साथ छेड़ बैठा हो युद्ध
भीषण शीत और झुलसती गरमी की
स्‍वीकार न हो उसे कोई दासता ?
व्‍यर्थ है अनुमान लगाना ।
और सख़्त हो गए हैं नीले तुषारनद ।
शिशिर की हताश लहरें
पैदा कर रही हैं मृगजाल तरह-तरह के ।
पर इस श्‍वेत उबाल में
झुलस गया मैं इस बर्फ़ीली चमक में ।
अपने शरीर और आत्‍मा से
अनुभव कर रहा हूँ
कि जीवित है वह शाश्‍वत यात्री-अपोलो !

- लियानीद मर्तीनफ़

साभार- कविता कोश
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!