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viral shayari on social media twenty seven july

वायरल

वायरल शायरी: मुद्दत हो गई है चुप रहते रहते, कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मुद्दत हो गई है चुप रहते रहते,
कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते

तभी तक पूछे जाओगे, जब तक काम आओगे...
चिरागों के जलते ही... बुझा दी जाती हैं "तीलियां"...!!

तो क्या हुआ जो दोस्त नहीं मिलते हमसे.....
मिला तो रब भी नहीं हमे, मगर इबादत तो बंद नहीं की.

तू अपने गरीब होने का दावा मत कर ए दोस्त,
हमने देखा है तुझे बाजार से टमाटर लाते हुए।

हवाओं, बादलों में न जाने क्या साजिशाना बात हुई,
मेरा ही घर मिट्टी का था, वहीं सारी बरसात हुई।।

लफ्ज़ों के दांत नहीं होते,
पर ये काट लेते हैं
दीवारें  खड़े  किये  बगैर,
बांट देते हैं 

जिंदगी छोटी नहीं होती है जनाब .... 
लोग जीना ही  देर से शुरु करते है

"मैंने कुछ लोग लगा रखे हैं.....
'पीठ पीछे' बात करने के लिए,

'पगार' कुछ नहीं है उनकी..... 
पर काम बड़ी 'ईमानदारी' से करते हैं"

यहां हर किसी को दरारों में झांकने की आदत है...
दरवाजे खोल दो, कोई पूछने भी नहीं आएगा...

मत समझिये कि मैं औरत हूं, नशा है मुझमें
मां भी हूं, बहन भी, बेटी भी, दुआ है मुझमें।

हुस्न है, रंग है, खुशबू है, अदा है मुझमे
मैं मुहब्बत हूँ, इबादत हूँ, वफ़ा है मुझमें।

कितनी आसानी से कहते हो कि क्या है मुझमें
ज़ब्त है, सब्र-सदाक़त है, अना है मुझमें।

मैं फ़क़त जिस्म नहीं हूँ कि फ़ना हो जाऊं
आग है , पानी है, मिटटी है, हवा है मुझमें।


(ये शायरी सोशल मीडिया में लोकप्रिय है। अगर आपको इनके लेखक का नाम मालूम हो तो साझा करें। शायरी के साथ शायर का नाम लिखने में हमें ख़ुशी होगी।)
 
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