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ryan international school child murder case pradyuman thakur viral kavita
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वायरल कविता : इक था प्रद्युम्न

  • काव्य डेस्क, नई दिल्ली
  • बुधवार, 13 सितंबर 2017
इक था प्रद्युम्न 

निकला था घर से आज इक नन्हा परिन्दा 
छोटी सी उम्र में पढ़ने के लिए 
किसे पता था रहेंगे उसके सपने अधूरे 
जो थे आसमान में उड़ने के लिए 
मासूम सी थी सूरत उसकी 
जो सबको मोह लेती थी 
अजनबी होता था जो उसके लिए 
हंसी उसकी उसे भी खुशी देती थी 
मासूमियत छलकती थी जिसके लफ़्ज़ों से 
वो दरिन्दगी का शिकार हो गया 
सदमे में था जहां मोहल्ला 
और उसका परिवार रो-रो कर बीमार हो गया 
क्या हाथ नहीं कांपे उस हैवान के 
जिसने चंद पलों में इक मां की ख़ुशियां छीन ली 
कैसे समाज में रहता है तू सुभाष 
इंसानियत को इक अजीब सी घिन्न दी 
क्या मिलेगी उसके क़ातिलों को सज़ा 
आज अंधे क़ानून में इक नई उम्मीद ढूंढ रहे हैं 
कैसे भूलेंगे उस मासूम के वो अल्फाज़ 
जो उसने अपनी तोतली ज़ुबान में कहे हैं 
हैवानियत को भी शर्म आई होगी 
जब उस परिंदे की चीख़ निकली होगी 
क्या होगी सज़ा उन हैवानों को 
क्या हमारी सरकार थोड़ी सी भी पिघली होगी 
 
- सुभाष सिंह पुनियां

(ये कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।)
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