आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mud Mud Ke Dekhta Hu ›   Zara hamen bhi batana

मुड़ मुड़ के देखता हूं

ज़रा हमे भी बताना

vivek kumar

1 कविता

19 Views
नज़रें मिलाकर फिर नज़रें चुराना
क्या हो रहा है ये, ज़रा हमको बताना

तुम्हारे तो चर्चे हैं लाखों हज़ार
काली है जुल्फें, गुलाबी रुख़सार
बस एक बार हमको तुम धीरे से कह दो
कि हो गया तुमको हमसे भी प्यार

अब जाने दो, छोड़ो भी, यूं हमसे क्या शरमाना
क्या हो रहा है ये, ज़रा हमको भी बताना।

मैं देखूं जो तुमको, तुम नज़रें झुका लो
थोड़े इतंज़ार में अपनी पलकें बिछा लो
मैं सितारे सा जादू तेरा आँचल भर दूं
मेरे नाम की मेहंदी हाथों में सजा लो

कभी झेंप जाना फिर नज़रें मिलाना
क्या हो रहा है ये, ज़रा हमको भी बताना।

दुनिया को दरकिनार कर तुझमे खो जाऊँ
ख्वाहिश है तेरी जुल्फों की बदली में सो जाऊं
जब मैं न देखूं तुझको बेचैन से हो जाऊं
या तेरी कमी सोच खुद को गम में भिगो जाऊँ

लेकिन जब तू देखे मुझे, मेरा उठकर चले जाना
क्या हो रहा है ये, ज़रा हमको भी बताना।

- विवेक कुमार

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!