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struggling story of actor pankaj kapoor

मुड़ मुड़ के देखता हूं

‘करमचंद’ के बाद ‘फटीचर’ बना था मैं !

जिंदगी की डायरी से- पंकज कपूर

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बचपन से ही मेरा रुझान एक्टिंग की तरफ था। स्कूल, कॉलेज में नाटकों में भाग लेता ही रहता था। फिर जब कॉलेज का दौर शुरू हुआ, तो ‌इरादा किया कि इसे बतौर पेशा अपनाना चाहिए। बस वहीं से यह सब शुरू हुआ।

मैंने यह बात अपने पिता को बताई, तो उन्होंने बस यह कहा कि अगर तुम्हें एक्टिंग करनी ही है, तो पहले यह जानने की कोशिश करो कि यहां का ग्लैमर तुम्हें खींचता है या तुम्हारे अंदर सच में जुनून है। मेरे घर में हमेशा से पढ़ाई-लिखाई का माहौल रहा। फिर भी मुझे लेकर कभी मेरे माता-पिता को यह नहीं लगा कि मुझे यह करना चाहिए या यह नहीं। जब मैं छोटा था, तब मां ही मुझे स्कूल के स्किट्स के लिए तैयार करती थीं। इसके बाद उन्होंने मुझे मशवरा दिया कि पहले मैं कहीं एक-दो कॉलेजों में अप्लाई करूं और तालीम लूं।

मैंने फिल्म इंस्टीट्यूट और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अप्लाई किया। मेरा सेलेक्शन नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में हो गया। बस वहीं से मेरी तालीम शुरू हुई। मुझे बहुत अच्छे शिक्षक मिले। खासतौर पर, इब्राहिम अलकाजी, वह नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक थे। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला।  हां, वह थोड़े सि्ट्रक्ट जरूर थे, लेकिन दिल के नरम थे। वहां के माहौल ने हमें अनुशासन सिखाया। जब मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से पास हुआ, तो कुछ साल वहीं अभिनेता के तौर पर काम करने लगा।

फिर बाहर थोड़ा काम किया। वर्ष 1982 में फिल्म 'गांधी' में एक छोटा रोल मिला। उस फिल्म में गांधी जी के दूसरे सेक्रेटरी प्यारेलाल का रोल निभाया था, लेकिन उसी फिल्म की हिंदी डबिंग में मैंने गांधी जी के किरदार, जिसे बेन किंग्सले ने निभाया था, की आवाज की डबिंग करने का सबसे बड़ा काम भी किया। उसी दौरान मेरे और एनएसडी के बीच एक गलतफहमी हो गई। वहां से कहा गया कि मैं यह फिल्म छोड़ दूं, लेकिन मैं फिल्म के निर्देशक और निर्माता को वचन दे चुका था, तो मजबूरन मुझे एनएसडी ही छोड़ना पड़ा।

अब मुश्किल थी कि रोजगार कहां से मिले? मैं मुंबई में ही था, तो श्याम बेनेगल फिल्म 'आरोहण' बना रहे थे। मेरे दोस्त ओम ने कहा एक बार जाकर मिल लो तुम बेनेगल जी से। मैं गया, उनसे मिला और उन्होंने मुझे कास्ट कर लिया, लेकिन मसला तो फिर भी सर्वाइवल का था। जिस तरह की फिल्में मैं कर रहा था, उनमें तो पैसा नहीं था, हां काम करने का भरपूर मौका मिलता था। तभी टेलीविजन का दौर शुरू हो रहा था। तब 'करमचंद' नाम के एक सीरियल का प्रस्ताव मुझे मिला।
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