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shabana azmi big fan of poet Faiz Ahmad Faiz

मुड़ मुड़ के देखता हूं

शबाना आज़मी ने नहीं पढ़ी उर्दू तो 'फ़ैज़' ने कहा- नामाक़ूल हैं तुम्हारे मां-बाप

मोहम्‍मद अकरम, नई दिल्ली

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मशहूर गीतकार और शायर कैफ़ी आज़मी की बेटी शबाना आज़मी हिंदी फ़िल्मों की एक मक़बूल अदाकारा हैं। उनके अभिनय के प्रशंसक बेशुमार हैं। लेकिन शेरो-शायरी को पसंद करने वाली शबाना आज़मी ख़ुद भी एक शायर की बहुत बड़ी प्रशंसक हैं। यह शायर और कोई नहीं बल्कि फै़ज़ अहमद फ़ैज़ हैं। एक क़िस्सा है जब शबाना आज़मी की अपने पसंदीदा शायर फै़ज़ अहमद फ़ैज़ से मुलाक़ात हुई थी। रूस की राजधानी मास्कॉ में हुई शबाना आज़मी की इस मुलाक़ात को तीन दशक से भी ज़्यादा हो चुके हैं। 

शबाना आज़मी अपनी इस मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए कहती हैं, 'फैज़ अहमद फैज़ मेरे पूरी दुनिया में सबसे पसंदीदा शायर हैं। एक बार ऐसा हुआ था कि मॉस्को फ़िल्म फेस्टविल के दौरान पता चला कि फैज़ साहब भी वहीं हैं, तो मैं बहुत ख़ुशी से उनसे मिलने के लिए गई। लेकिन उन्होंने कहा कि तुम शाम को आओ मिलने के लिए, तो मैं फिर  उनसे मिलने गई। फै़ज़ साहब ने कहा कि कुछ बिल्कुल नए शेर हो गए हैं, लो पढ़ो। तो मैंने ज़रा सा खिसियाते हुए और सर खुजाते हुए कहा कि फैज़ चचा मैं उर्दू नहीं पढ़ सकती।' 

शबाना आज़मी आगे बताती हैं कि इस पर उन्होंने चौंक कर कहा, क्या मतलब है तुम्हारा? नामाक़ूल है तुम्हारे मां-बाप। मैंने अपनी बात रखते हुए कहा दरअस्ल मैं शायरी ख़ूब अच्छी तरह से समझती हूं। आपकी बहुत बड़ी मद्दाह (प्रशंसक) हूं और आपकी बहुत बड़ी फैन हूं। मैं उर्दू भी समझती हूं लेकिन लिख पढ़ नहीं सकती। आपकी पूरी शायरी मुझे मुंह ज़बानी याद है। 

हालांकि, जब शबाना आज़मी ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी सुनाना चाही तो उस वक़्त उन्हें कुछ भी याद नहीं रहा। बजाए फ़ैज़ की शायरी सुनाने के उन्होंने किसी और की शायरी सुना दी। शबाना ने एक शेर सुनाया, देख तू दिल के जां से उठता है, ये धुआं कहां से उठता है। 

शबाना कहती हैं, 'शेर सुनने के बाद उन्होंने सिगरेट का एक कश लेकर कहा, भई वो तो मीर का कलाम है। तो मैंने कहा मेरा मतलब वो थोड़े ही था।' इसके बाद शबाना ने फिर एक शेर सुनाया, 'बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी'।  शबाना आज़मी बताती हैं, 'फै़ज़ अहमद फ़ैज़ ने अपनी सिगरेट रखी और कान खुजाते हुए कहा, देखिए मीर की हद तक तो ठीक था। लेकिन बहादुर शाह ज़फ़र को मैं शायर नहीं मानता।' 

शबाना कहती हैं, 'मैं उस वक़्त बहुत बूरा और लज्जित महसूस कर रही थी। मुझे लगा यह सचमुच समझेंगे कि मुझे कुछ नहीं आता। उसके बाद जब मैं बाहर गई और उनकी तमाम शायरी पटपट मुझे याद आ गई। लेकिन उस वक़्त मैं इतनी ज़्यादा घबरा गई थी। यह मेरी ज़िंदगी कि एक ऐसी घटना है, जो मुझे हमेशा याद रहेगी।' 

फै़ज़ को शबाना आज़मी सिर्फ़ एक शायर के तौर पर नहीं दिखते बल्कि वो कहतीं हैं कि फै़ज़ अहमद फै़ज़ मेरे लिए केवल एक शायर नहीं हैं। वह फ़िलॉस्फ़र हैं। वह मार्गदर्शक हैं। उन्होंने मेरी ज़िंदगी को कई तरह से प्रभावित किया है। और मुझे उस वक़्त ताक़त दी जब मैं असहाय महसूस करती थी। इसलिए मेरे दिल में उनके लिए एक ख़ास जगह है।
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