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nida fazli's life and Gwalior

मुड़ मुड़ के देखता हूं

'पेड़ में बैठे भूत को भगाने के लिए क़ुरआन का सहारा'

काव्य डेस्क-अमर उजाला, नई दिल्ली

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निदा फ़ाज़ली पैदा तो दिल्ली में हुए मगर ताउम्र ग्वालियर उनके दिल के क़रीब रहा। वो अक्सर महफ़िलों और मुशायरों में ग्वालियर की बातें करते। यह क़िस्सा भी ग्वालियर से ही जुड़ा हुआ है। उन्होंने अपनी किताब 'दीवारों के बीच' में अपने जीवन के कई संस्मरणों का उल्लेख किया है।

वह लिखते हैं ग्वालियर के तंग भरे मुहल्ले में लोग अंधेरे में इमली के पेड़ में बैठे भूत को भगाने के लिए क़ुरआन शरीफ़ का सहारा लेते हैं। यहां आपस की लड़ाई में बच्चे तो जूझते हैं साथ ही औरतें भी उलझ पड़ती हैं। बच्चे पिछली बातों को भूलकर आपस में फिर से मिल जाते हैं पर औरतों का मनमुटाव कई दिनों तक चलता रहता है। पास में ही नीम का पेड़ भी है। इमली और नीम के पेड़ की उम्र का वहां कोई नहीं है। दोनों पुराने बुज़ुर्ग इलाके की चौकीदारी भी करते हैं। पास का कुआं सारी लड़कियों का हमराज़ है। 

वह इनके राज़ किसी को नहीं बताता। यहीं रेत में क़ारुन बादशाह का सोने का खज़ाना गुम हो गया था। जो सूरज की रोशनी में आज भी रेत के ज़र्रो में झिलमिलाता है। लोग रात को कच्ची शराब के नशे में नाचते हैं। औरतें घर के मर्दों की मिलकियत हैं। ये कभी विधवा नहीं होतीं। परिवार के आख़िरी मर्द तक इनकी मांग भरी रहती है। यहां के इमाम कभी मुस्कुराते नहीं हैं। पंडित जी राम राम के जाप में लीन पानी भरते रहते हैं। यहां के कबूतर सैयद होते हैं। उनके परों की हवाओं से कई बीमारियों का इलाज हो जाता है। लड़कियों का विवाह बिना छानबीन के हो जाता है। बरसों की आज़ाद मिज़ाजी को शादीशुदा जिंदगी में ढलने में काफी वक्त लगता है। पति अपनी मर्ज़ी का मालिक है। मुहल्ले की औरतें पति को वश में करने के लिए नई तरकीबें सुझाती हैं। ताबीज़ मंगवाती हैं। 

जिंदगी एक ढर्रे में ही कटती जाती है। यहां जिन्‍न इनसानों से अलग होता है और वो मिस्टर एक्स की तरह सबको देख सकता है। तांगेवाला झल्लाकर कहता है कि अजी औरत और घोड़ा बिना चाबुक के कहां चलते हैं। रोना हर मां-बेटी के मिलने बिछड़ने की रस्म है। बड़ी छोटी कई ख़ानदानी हवेलियां हैं इनमें किराएं से काफ़ी आमदनी होती है। लोग जब पतंग काटते हैं तो खुदा का शुक्र करते हैं और जब इनकी पतंग कटती है तो इसे भी खुदा की मर्ज़ी समझते हैं। ग़ुस्सा सैलाब की तरह चढ़ता है। मां तक दुश्मन बन जाती है। बहनें डाइन हो जाती हैं। 

बंगाली बाबू की पाठशाला में ज़रा सी भूल-चूक पर डंडे से हथेलियां लाल होती हैं। कभी मुर्ग़ा भी बनाया जाता है। बंगाली बाबू अकेले हैं। बंगाल के भूकंप के बीच बचपन से ही यहां आकर बसे हैं। बंगाली बाबू को बीमारी में खांसी से ख़ून आने लगता है। माताएं अपने बच्चों को उनकी पाठशाला से उठा लेती हैं। घरों से दूर उनके लिए फ़ुटपाथ पर एक छप्पर डाल दिया जाता है। जहां अकेले एक बांस की चारपाई पर वे दिनभर खांसते रहते हैं। उनके मरने के बाद उस छप्पर में तेल छिड़कर आग लगा दिया जाता है। 

बच्चे का पढ़ाई का मन नहीं करता है तो उसके लिए नाश्ता बंद हो जाता है। स्कूल के वक़्त से पहले एक औरत क़ुरआन पढ़ाती है। यहां के तोतों को क़ुरआन की कई आयतें याद हैं। उसे पक्का मुसलमान बनाने की कोशिश की जाती है। इस दौरान वह बेज़ुबान जंगल का बाशिंदा अपनी उम्रकैद पर आंसू बहाता है। भारी भरकम ज्ञान का बोझ और खुले आकाश से जंगल की दूरी का ग़म उसे एक दिन बैठे-बैठे ढेर कर देता है। तोते को नहला धुलाकर एक नये सफ़ेद कपड़े में लपेटकर आंगन में चमेली के बेल के नीचे दफ़्न कर दिया जाता है। बाद में फ़ाति‌हा पढ़कर उसे जन्नत में आराम करने के लिए छोड़ दिया जाता है। 

(निदा फ़ाज़ली की किताब 'दीवारों के बीच' का अंश) 
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