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kaifi azmi a complete shayar you can got in amarujala kavya   
मुड़ मुड़ के देखता हूं

ज़मींदार पिता चाहते थे कैफ़ी आज़मी मौलाना बनें पर...

  • काव्य डेस्क-अमर उजाला, नई दिल्ली
  • मंगलवार, 18 जुलाई 2017
हिंदी फ़िल्मों की अदाकारा शबाना आज़मी के पिता कैफ़ी आज़मी साहब हिंदुस्तान की शायरी में एक दैदीप्यमान नक्षत्र की तरह चमकते रहे। बाल्यावस्‍था में ही शायरी का शौक़ इनको जो चढ़ा वह ता उम्र चढ़ता ही रहा। सच कहा है जो हमेशा चढ़ती है वह ख़ुदा की मस्ती होती है। वो कभी उतरती नहीं है। प्रेम और इश्क का रंग भी अगर सच्‍चा हो तो हमेशा बढ़ता ही जाता है। कैफ़ी आज़मी के अंदर भी मोहब्बत इस तरह जवां थी कि वह दिनों दिन शायरी और ग़ज़ल के रूप में बढ़ती ही गई। उन्होंने प्रेम को जिया और एक से एक बेहतरीन कलाम उर्दू अदब को दिए। 

ज़मींदार पिता चाहते थे कि बेटा कैफ़ी बड़े होकर मौलाना बनें लेकिन ख़ुदा को कुछ और ही मंज़ूर ‌था। कैफ़ी ग़रीब और मजदूरों के हक़ में लड़ना चाहते थे। वह मानव समुदाय में समानता की अलख जगाना चाहते थे। पिता ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। हालांकि उनका थोड़ा शायरी के प्रति झुकाव कम था। एक बार बचपन में पिता ने उन्हें एक गीत की एक लाइन बताकर कहा कि इस पर अपने दिल के उद्गार व्यक्त करो। इसे ग़ज़ल में बदलो। होना क्या था बालक कैफ़ी को मौक़ा मिल गया और उन्होंने इसे बड़ी शिद्दत से पूरा भी किया। उन्होंने इस पर एक ख़ास अदब की ग़ज़ल रच डाली।

गांव के भावुक माहौल में कैफ़ी को कविताएं पढ़ने का शौक़ लगा। घर में पिता के अलावा अन्य सदस्य उनके ग़ज़ल के प्रेम से नाराज़ नहीं थे। हालांकि कई बार उनको पिता की बेरुख़ी का सामना करना पड़ा। महफ़िलों में शेरो-शायरी वह बेहद मोहक अंदाज़ से सुनाते थे। कई बार उनको इसके लिए फटकार भी मिलती थी। इस पर वह रोते हुए अपनी वालिदा के पास आ जाते और कहते, 'अम्मा एक दिन दुनिया में मैं बड़ा शायर बनूंगा, आप देखना'।
कैफ़ी एक संपूर्ण शायर थे। उम्दा गीतकार भी थे। उन्होंने देशभक्ति पर 'कर चले हम फ़िदा जां वतन साथियों' गीत लिखा तो दूसरी तरफ़ 'कागज़ के फूल' फ़िल्म का गीत 'वक़्त ने किया क्या हंसी सितम' भी लिखा। फ़िल्म हीर रांझा का गीत 'मिलो न तुम तो हम घबराए, मिलो तो आंख चुराएं' प्रेम की दुविधा को दिल से बयां करता है।    
               
 
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