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मुड़ मुड़ के देखता हूं

आवाज है अंजाम तक

Harshit Sharma

2 कविताएं

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अंदाज का हुआ आगाज
सूरज की लाली से हुआ आरंभ,
बीत गई फिर एक रात
निषाद के आने की राह में.. 

चाहे कोई अब मुझे निशाचर भी बोले
यह तो निशान पर चढ़ गया
यह तो शान पर चढ़ गया,
चढ़ा-ऊपरी की होड़ में
बंद करो-परिस्थितियों के उतार चढ़ाव का बहाना.. 

हमने बोला चिल्लाकर बोला,
तुम्हारा सुनना हमने सुना,
तुम्हारी बोली अब अबोल क्यों है?
हमने कुबोल कहा, ना जी ना
विरोध हुआ है,अबोला हो क्या?
अनबोला क्यों हो, तुम तांबुल खा रहे क्या?

यह बोली है ,हम बोलेंगे
कब तक अबोल रहोगे,
यह कुबोल नहीं है हम बोलेंगे
हम ढीठ हैं हम बोलेंगे,,

यह आवाज है झिझक नहीं
हम बेझिझक है,झिझकना नहीं है
तुम अनबोले क्यों, हमें जानना है
तुम जान जाओ, हमें जानना है

तुम ज्ञानी हो, पूर्वज्ञानी हो
हम गृहज्ञानी ही नहीं,
तुम अज्ञानी हो?

अरे कुछ तो कहो,
अरे बोली बोलो
अबोला क्यूँ हो
तुम्हें रंज नहीं ,तुम करंज तो नहीं,,

अभी तो यह आगाज है
यह आवाज है,,
परंजय तक गूंजेगी?

ये नए लोग हैं नई सोच है
नहीं रुकेगी नहीं थमेगी

आगाज है अंजाम तक
हम एक हैं ,हम नेक हैं,हम अनेक हैं
हम बोल रहे हम जीतेंगे
आवाज है ,अंजाम तक ।।

- हर्षित शर्मा 

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