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famous poet munawwar rana remembering renowned poet firaq gorakhpuri

मुड़ मुड़ के देखता हूं

फ़िराक़ लोग ढूँढेंगे हमें भी हाँ मगर सदियों के बाद 

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जो शख़्स अपने कद्रदान से ये कहे कि जब आप अपने के साथ दारू वाली भी लिखते हैं तो आप इलाहाबाद पहुँचकर जिसे भी अपना नाम बतायेंगे वह आपको मेरे ठिकाने पर ले आयेगा। जो शख़्स इन्शोरेंस एजेंट को डाँटते हुए बता रहा हो कि मैं कोई मच्छर या मक्खी नहीं हूँ जिसके इन्तिक़ाल पर नगर पालिकाएँ सनद मर्ग (मृत्यु प्रमाण पत्र) जारी करती हैं, मैं फ़िराक़ हूँ, फ़िराक़!! मैं जिस रोज़ इस दुनिया को ख़ैरबाद कहूँगा उस दिन चीख़ते-चीख़ते रेडियो और अख़बारात के गले बैठ जायेंगे। 

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक 'ढलान से उतरते हुए' जो हम पे गुज़री, सो गुज़री-4 में मशहूर शायर मुनव्वर राना लिखते हैं, "जिस शख़्स ने सारी ज़िंदगी दस्तख़त की जगह फ़िराक़ लिखा हो, सिर्फ़ फ़िराक़, न आगे कुछ न पीछे, न ये डिग्री न वो डिग्री, न ये एवार्ड न वो सम्मान! उसकी ख़ुदएतमादी (आत्मविश्वास) की क़सम तो ईमानदार दुश्मनों को भी फ़ौरन खा लेनी चाहिए। 

जिस शख़्स ने चैम्बर ऑफ कॉमर्स की मीटिंग में ब मांगे दुल्हन (एलानिया और ज़ोर देकर) कह दिया हो कि आप लोग उर्दू इसलिए पढ़ें कि अफ़सर बनने के बाद अफ़सर नज़र भी आयें। 

अपनी पुर सेह्र (जादू भरी) शख़्सित और बेइन्तिहा तालिमी लियाक़त के ज़रिये कुछ भी हासिल कर लेने वाले फ़िराक़ साहब मीर तक़ी मीर के बाद दूसरे ऐसे शायर थे जिन्होंने अरबाबे इक्तिदार और मसलहतों के दरबार में कभी सजदा करने की कोशिश नहीं की।" 

मुनव्वर राना कहते हैं फ़िराक़ उर्दू वालों की तंग नज़री, हिंदी वालों के सांप्रदायिक पूर्ण रवैये और इक्तिदार के मठाधीशों की चश्मापोशी का शिकार हो गए। फ़िराक़ साहब की शख़्सियत को याद करते हुए लिखते हैं कि फ़िराक़ साहब की इल्मी अदबी और शेरी सलाहियत पर तनक़ीद करने के लिए जितने इल्म और दानिशमन्दी (बुद्धिमत्ता) की ज़रूरत थी उतना इल्म ही फ़िराक़ साहब के अलावा पूरे बर्रेसग़ीर (उप महाद्वीप) में किसी दूसरे के पास नहीं था। यूँ भी फ़िराक़ साहब के इल्म के पंजे के नीचे कई अदबी उक़ाब फड़फड़ाया करते थे लिहाज़ा उनके दोस्त अहबाब तलाश करना एक कारे बेमसरफ (व्यर्थ का काम) ही था। 

मुनव्वर लिखते हैं, "फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अपनी कमगोई (कम बोलने की आदत) तरक़्क़ी पसन्द के मज़बूत हिसार (रक्षा पंक्ति) और पंजाबियों की पंजाब नवाज़ी के सबब हर तरह से बच गए, जिगर साहब बेचारे अपने हुस्ने सुलूक (व्यवहार कुशलता) और ख़ाकसाराना रविश (विनम्र जीवन शैली) के सबब तनक़ीद को भी देहाती मुसलमान की तरह तबलीग़ (प्रचार प्रसार) के अन्दाज़ में चुपचाप सुनने की वजह से किसी हद तक महफूज़ रहे लेकिन फ़िराक़ साहब किसी समझौते, किसी शरीफ़ाना मसलहत और किसी मुनाफ़िक़ाना (कपटपूर्ण) डिप्लोमेसी के क़ायल ही नहीं थे। बोलने से कभी चूकते नहीं थे, आदमबेज़ारी के साथ-साथ खुद सताई (अहं) जैसी मोहलक (घातक) बीमारी के शिकारी थे। अपने बेबाक फ़िक़रों (जुमलों) और बेहंगम क़हक़हों से किसी भी महफ़िल के मुँह का मज़ा बिगाड़ देते थे। जिसके नतीजे में उनकी सारी उम्र अदबी अदालत के कटघरे में खड़े-ख़ड़े ही गुज़र गयी। हालाँकि फ़िराक़ साहब की यह तमाम ग़ैर शायराना हरकतें, अक्खड़पन और चिड़चिड़ा लहजा उनकी उम्र भर की नामुरादियों और उदासियों के ख़ौफ़नाक चेहरे पर पड़े हुए दबीज़ पर्दे की तरह थीं, लेकिन तंग नज़र अहबाबस, कम नज़र दुश्मन, अण्डर ट्रायल नाक़िदीने अदब और पॉकेट साइज़ शायरों और अदीबों ने उनके होठों पर जमी हुई पान की पीक को भी किसी मज़लूम का लहू साबित करने में ताख़ीर (देरी) नहीं की। शबनम नक़वी और रमेश दीक्षित जैसे कुछ कद्रदानों ने अफ़वाहों का कोहरा साफ़ करने की बहुत कोशिश की लेकिन तब तक ज़माना तेज़ रफ़्तारी से आगे बढ़ चुका था।"
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