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कवियों-शायरों और उनकी रचनाओं से जुड़े यादगार किस्से-संस्मरण-आपबीती

हसरत जयपुरी : याद किया दिल ने कहां हो तुम...

  • काव्य डेस्क, नई दिल्ली
  • सोमवार, 18 सितंबर 2017

हसरत जयपुरी का करियर एक बस कंडक्टर के रूप में शुरू हुआ इसके बाद वह मुशायरों में भी शिरकत करने लगे।

विद्रोही तेवर और जनसरोकारों के कवि बाबा नागार्जुन

  • अतुल सिन्हा, नई दिल्ली
  • बुधवार, 13 सितंबर 2017

सत्तर और अस्सी के दशक में वामपंथी धारा के साथ-साथ एक ऐसा साहित्यिक-सांस्कृतिक उभार था जो सत्ता और निरंकुशता के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ था। इसी दौर के जनकवि बाबा नागार्जुन की शख़्सियत को याद कर रहे हैं अतुल सिन्हा।

किस शायर ने मुनव्वर राना को दिया था नाम बदलने का मशवरा?

  • काव्य डेस्क, नई दिल्ली
  • बुधवार, 13 सितंबर 2017

मां की क़द्र और अहमियत को उर्दू शायरी का ख़ास सरमाया बनाने वाले मुनव्वर राना शोहरत की जिस बुलंदी पर हैं, वो हर शायर का एक ख़्वाब होता है।

जब कवि प्रदीप के देशभक्ति गीतों की पाकिस्तान ने की नक़ल

  • मोहम्मद अकरम, नई दिल्ली
  • बुधवार, 13 सितंबर 2017

मख़दूम मोहिउद्दीन: निज़ाम ने सुनाया था इस शायर की मौत का फ़रमान

  • राजेश कुमार यादव, आज़मगढ़
  • गुरुवार, 31 अगस्त 2017

जांनिसार अख़्तर : एक शायर जिसका मयार बहुत बड़ा है

  • राजेश कुमार यादव, आज़मगढ़
  • गुरुवार, 31 अगस्त 2017

यह जांनिसार अख़्तर की प्रसिद्धी ही थी कि जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें पिछले 300 सालों की हिन्दुस्तानी शायरी को एक जगह पर इकट्ठा करने का जिम्मा सौंपा था।

'फ़िल्मी चका-चौंध ने शकील बदायूंनी की शायरी में चार चांद लगा दिये थे'

  • काव्य डेस्क, नई दिल्ली
  • गुरुवार, 31 अगस्त 2017

गीतकार और शायर शकील बदायूंनी मुशायरों की जान मान जाते थे। वे जिस शहर के मुशायरे में जाते वहां बरसों तक उनकी छाप मौजूद रहती। 

हिन्‍दुस्‍तानियत की ज़िद का शायर - फ़िराक़ गोरखपुरी

  • राकेश मिश्रा, वर्धा
  • मंगलवार, 29 अगस्त 2017

फ़िराक़ साहब मानते थे कि बड़ा अदब बड़े ज़माने में पैदा होता है और वे अपने आपको बड़े ज़माने की पैदाइश मानते थे। यह कहना शायद बहुत ग़लत नहीं होगा कि फ़िराक़ आधुनिक शायरी के आख़िरी क्‍लासिक शायर थे। फ़िराक़ को याद कर रहे हैं राकेश मिश्रा।

बेकल उत्साही: जब नेहरू ने दिया शायर को तख़ल्लुस

  • राजेश कुमार यादव, आज़मगढ़
  • सोमवार, 28 अगस्त 2017

अदम: आख़िर पीनी तो शराब ही थी, यहां क्या और वहां क्या ?

  • अकरम रज़ा हिंदी , नई दिल्ली
  • रविवार, 27 अगस्त 2017

'मोहन राकेश तो उठकर चले गए, मुझे लगा मैं उठाईगीरों के बीच आ फंसा हूं'

  • काव्य डेस्क-अमर उजाला, नई दिल्ली
  • शुक्रवार, 25 अगस्त 2017
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