आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Azeez Filmi Nagme ›   flashback of ram teri ganga maili song
flashback of ram teri ganga maili song

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

हुस्न पहाड़ों का... क्या कहना कि बारहों महीने यहां मौसम जाड़ों का...

संजय अभिज्ञान, नई दिल्ली

4935 Views
कभी पढ़ा था कि कविता शब्दों का संगीत है और संगीत सुरों की कविता। पीछे मुड़कर देखता हूं तो कई ऐसे फ़िल्मी नग़्मे याद आते हैं, जिनका म्यूज़िक भी ग़ज़ब था और बोल भी। मेरी इस लिस्ट में सबसे ऊपर है फ़िल्म 'राम तेरी गंगा मैली' का युगल गीत - "हुस्न पहाड़ों का, क्या कहना कि बारहों महीने यहां मौसम जाड़ों का......``

सन् 1985 की शायद आती हुई सर्दियां थीं, जब अचानक दिल्ली के मॉरिस नगर में कई बड़े चौराहों पर राज कपूर की इस फिल्म के बोल्ड पोस्टर लग गए थे। कैम्पस की नई पौध को लुभाने के लिए मंदाकिनी और राजीव कपूर के एक बेहद अंतरंग सीन को पोस्टर पर उकेरा गया था। फ़िल्म इसलिए भी चर्चित हो गई थी कि उसमें हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार यह करिश्मा हुआ था कि झरने के नीचे नहाती बाला का फ्रंटल न्यूडिटी शॉट बिना एडल्ट सर्टिफ़िकेट के पास करवा लिया गया था!

सुपर डुपर हिट रही इस फ़िल्म का उतना ही चर्चित फैक्‍ट यह भी था कि उसके गाने एक से बढ़कर एक नगीने थे। 'सुन साहिबा सुन, प्यार की धुन' गली गली बजने लगा था। 'तुझे बुलाए ये मेरी बांहें, कि ऐसी गंगा नहीं मिलेगी'.... ने रेडियो और कैसेटों पर कमाल कर दिया था। फ़िल्म का टाइटिल सॉन्ग गंगा की बदहाली पर था, जिसमें एक लाइन थी - 

हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है,
ऋषियों के संग रहने वाली पतितों के संग रहती है।
लाई दूध जैसी धारा सीधा स्वर्ग से उतारा,
करके गंगा को ख़राब देते गंगा की दुहाई...


इन्हीं शानदार गीतों की लड़ी में किसी मनके की तरह चमकता हुआ गाना था  'हुस्न पहाड़ों का'। राग पहाड़ी में सुरबद्ध। हिमालय की वादियों के सुबह सवेरे वाले अलौकिक सौंदर्य की बैकड्राप में शूट किया गया गाना। मुझे याद है दिल्ली के हंसराज कॉलेज के पास अंबा सिनेमा हॉल से जब ये फिल्म देखकर निकला था तो कई घंटों नहीं, कई दिनों तक यह गाना नशा बनकर मेरे दिलो दिमाग़ में रहा था। 

उसकी धुन, उसके बोल और उसका फ़िल्मांकन -- सब कुछ अद्भुत था। दर्शक को एक दूसरी दुनिया में ले जाने वाला। वास्तव में यह गाना मेरी स्मृति के उन चंद गानों में एक हैं जिसमें संगीतकार और गीतकार एक ही व्यक्ति हैं। स्वर्गीय रविंद्र जैन साहब ने यूं तो चोर मचाए शोर, फकीरा, सौदागर, गीत गाता चल, चितचोर और हिना समेत कई फ़िल्मों में अपने ख़ुद के बोलों को स्वर भी दिए हैं लेकिन राम तेरी गंगा मैली का ये गाना तो मन में ही बस जाता है...

गाने की सिचुएशन ऐसी है कि शहर से गंगोत्री घूमने आया एक आदर्शवादी नौजवान नरेन पहाड़ी गांव की झरने जैसी चंचल एक लड़की गंगा पर मुग्‍ध हो जाता है जो भोली-भाली है और साफदिल है। दोनों एक दूसरे में देवत्व पाते हैं। प्रेम पनप जाता है। एक भावुक पल में गंगा नरेन से वादा करती है कि वह नरेन को पहाड़ी रास्तों से गंगोत्री तक ले जाएगी ताकि नरेन अपनी दादी के लिए शुद्ध गंगा जल ला सके। अगले दिन सूरज निकलने से पहले ही नरेन गंगा के साथ बर्फ़ीली पहाड़ियों के सफ़र पर निकल पड़ता है। भोर के नैसर्गिक सौंदर्य की पृष्ठभूमि में लता जी की दिलकश आलाप के साथ गाना शुरू होता हैः 

हुस्न पहाड़ों का, ओ साहिबा हुस्न पहाड़ों का... 
क्या कहना कि बारहों महीने यहां मौसम जाड़ों का...


गाने की ये पहली दो लाइनें गंगा के होठों से बुलवाई गईं हैं। हीरोइन स्वछंदता के साथ अपने पहाड़ के मौसम पर फ़ख़्र जता रही है और साल में 10 महीने गर्मी से झुलसने वाले मैदानी शहर कलकत्ता से आए अपने प्रेमी को उलाहना भी दे रही है। 

लेकिन नौजवान नरेन अपनी उम्र के तक़ाज़ों से बंधा है और अपने मतलब की बात पकड़ते हुए जाड़ों के मौसम को गर्म जवानी से जोड़ता हैः 

हो... रुत ये सुहानी है मेरी जां रुत ये सुहानी है
कि सर्दी से डर कैसा संग गर्म जवानी है...


गाने के पहले अंतरे का आग़ाज़ सुबह की खूबसूरती पर नरेन की हैरानी से होता हैः
 
खिले खिले फूलों से भरी हुई वादी 
रात ही रात में किसने सज़ा दी 
लगता है जैसे यहां अपनी हो शादी...
लगता है जैसे यहां अपनी हो शादी...


लेकिन सहमी हुई पहाड़न बाला प्रणय के पलों में भी मन के भय को पेश करना नहीं भूलती और मीठी चुहल के साथ नरेन को छेड़ती है - 

क्या गुल बूटे हैं...
पहाड़ों में कहते हैं परदेसी तो झूठे हैं...
आगे पढ़ें

झरने तो बहते हैं, कसम ले पहाड़ों की जो कायम रहते हैं...

Comments
सर्वाधिक पड़े गए
Top
Your Story has been saved!