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remembrance of Mere Naseeb Mein Aye Dost song

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

ख़िज़ा के फूल पे आती कभी बहार नहीं...जब मजबूरी ने दिलों को तड़पाया

आनंद, अमर उजाला, नई दिल्ली

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'ख़िज़ा के फूल पे आती कभी बहार नहीं
मेरे नसीब में ऐ दोस्त, तेरा प्यार नहीं'


ये नग़मा 1969 में रिलीज़ फ़िल्म 'दो रास्ते' का है। गीत गुज़रे ज़माने के सुपर स्टार राजेश खन्ना और मुमताज पर फ़िल्माया गया है। किशोर कुमार की जादुई आवाज़ में इस गीत ने दिलों की तड़पन को बहुत ही भावुक अंदाज़ में व्यक्त किया है। गीत का सार है कि दुनिया की मजबूरी ने अक्सर प्यार करने वालों पर जुल्म ढाया है। गीत में दोस्त अपने अज़ीज़ को ये बताने की कोशिश करता है कि ज़िंदगी की मजबूरियां और परिस्थितियां कैसे प्यार करने वालों को अलग होने के लिए विवश कर देती हैं। इस कर्णप्रिय गीत के बोल आनंद बक्षी ने लिखे हैं। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने इसे संगीत से सजाया है। गीत में किशोर कुमार की आवाज़ है जो आज भी कई प्रेमियों को तन्हाई में सहारा दे रही है। 

आदमी बहुत से संबंधों से घिरा होता है। इश्क़ करते वक़्त एक बार आदमी इनका ख्याल रखता है। आदमी की सामाजिक ‌स्थिति भी इश्क को मुकम्मल करने में एक हद तक ज़िम्मेदार होती है। इस तरह संबंधों की खातिर प्रेमी-प्रेमिका कभी कभी भावुक होकर अपने प्रेम को भूल जाते हैं और तन्हाई के रास्ते में चलने को मजबूर हो जाते हैं। गीत ऐसी मुश्किलों को ही व्यक्त करता है। दुनिया में ऐसे बहुत से कारण है जब जिंदगी की निजी परेशानियां किसी को अपने अज़ीज से दूर कर देती हैं। उस समय जिंदगी खिज़ा जैसी ही महसूस होती है। ऐसी खिज़ी जिसमें कोई फूल भी नहीं खिलता है। तब एक महबूब अपनी महबूबा से या एक महबूबा अपने महबूब से यही कहती है कि 'मेरे नसीब में ऐ दोस्त, तेरा प्यार नहीं' 

'ना जाने प्यार में कब मैं, ज़ुबां से फिर जाऊं
मैं बनके आंसू खुद अपनी, नज़र से गिर जाऊं
तेरी क़सम है मेरा कोई ऐतबार नहीं
मेरे नसीब में...'


जब ज़िंदगी में प्यार से ज्यादा खुद की निजी जिम्मेदारियां या यूं कहें कि कुछ परिस्थितियां पैदा जाती हैं कि ज़िंदगी में प्यार से ज़्यादा बड़ी और कीमती दूसरी चीज़े लगने लगती है तो एक प्यार अपने प्यार से यही कहता है कि - 

'ना जाने प्यार में कब मैं, ज़ुबां से फिर जाऊं
मैं बनके आंसू खुद अपनी, नज़र से गिर जाऊं'


और अपने अज़ीज से ये बताने की कोशिश करता है कि अपनी निजी तकलीफों से परेशान होकर कब मैं अपने प्यार से मुकर जाऊं और दोस्त को वह ये भी बताने की कोशिश करता है कि' तेरी क़सम है मेरा कोई ऐतबार नहीं।'


'मैं रोज़ लब पे नई एक, आह रखता हूं
मैं रोज़ एक नए गम, की राह तकता हूं
किसी ख़ुशी का मेरे दिल को इंतज़ार नहीं
मेरे नसीब में...'


जब जिंदगी में खुशियों से ज्यादा ग़म मिलता है तो ख़शियों से मानो आदमी का भरोसा उठ जाता है। मन से एकांत प्रेमी तब अपनी प्रेमिका से यही कहता है कि किसी ख़ुशी का मेरे दिल को इंतज़ार नहीं।

'गरीब कैसे मोहब्बत, करे अमीरों से
बिछड़ गए हैं कई रांझे, अपनी हीरों से
किसी को अपने मुक़द्दर पे इख्तियार नहीं
मेरे नसीब में...'


ये अल्फाज़ अमीर-ग़रीब के बीच के प्यार को भी दर्शाते हैं। जब आपका अज़ीज आपसे ज्यादा अमीर होता है या यूं कहें कि आपके अजीज़ की जिंदगी आपसे बेहतर होती है। उसका सामाजिक दायरा ऊंचा होता है तो जिंदगी की मजबूरियों के बीच एक न एक दिन साथी अपने  साथी से बिछड़ ही जाता है। गीत के आगे के बोल इसे व्यक्त भी करते हैं। 

'गरीब कैसे मोहब्बत, करे अमीरों से
बिछड़ गए हैं कई रांझे, अपनी हीरों से
किसी को अपने मुक़द्दर पे इख्तियार नहीं'

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