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remembrance of Ek Ajnabi Hasina Se Yun Mulaaqat Ho Gayi song

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

एक अजनबी हसीना से यूं मुलाक़ात हो गई...

मोहम्‍मद अकरम, नई दिल्ली

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ज़िंदगी एक ऐसा अंजान सफ़र है जिसकी राहों से गुज़रने से जितना भी इंकार किया जाए, लेकिन इस सफ़र को जारी रखना ही पड़ता है। ख़ुशियां, ग़म, नाकामियां और तक्लीफ़ें इस सफ़र के अहम पड़ाव होते हैं। बाक़ी इंसानों की तरह ये पड़ाव मेरी भी इस छोटी सी ज़िंदगी के सफ़र में आए हैं।

हालांकि, यह सफ़र होता बड़ा दिलचस्प है। इसकी जो सबसे ख़ास, दिलकश और ख़ुशनुमा राह होती है वो है मोहब्बत। जब मैं ज़िंदगी के सफ़र में मोहब्बत की राह पर निकला तो बाक़ी तक्लीफ़देह पड़ाव मुझे अदना नज़र आने लगे। मोहब्बत शय ही ऐसी है जो इंसान को एक मक़सद और दुनियावी परेशानियों का मज़बूती से सामना करने की ताक़त और हौसला देती है।

1974 में आई फ़िल्म अजनबी का आनंद बख्‍शी का लिखा और आर.डी.बर्मन के संगीत से सजा यह गाना मुझे बहुत अज़ीज़ है, क्योंकि यह ज़िंदगी के सफ़र पर हुई उस अजनबी से हसीन मोहब्बत की यादें ताज़ा कर देता है। किशोर कुमार की आवाज़ में यह गाना सुनते हुए लगता है काश, मैं माज़ी (भूतकाल) में जाकर उससे मुलाक़ात के हर पल को कै़द कर सकता। किशोर दिलकश आवाज़ में गाते हैं.....

एक अजनबी हसीना से
यूं मुलाक़ात हो गई
फिर क्या हुआ ये ना पूछो 
कुछ ऐसी बात हो गई


इस गाने की सबसे ख़ूबसूरत लाइन मुझे 'एक अजनबी हसीना से, यूं मुलाक़ात हो गई' लगती है। पता नहीं, लेकिन जाने मुझे क्यूं लगता है कि मोहब्बत अजनबी से ही होती है। दसअस्ल, आप उस वक़्त तक अजनबी ही रहते हैं, जब तक मोहब्बत का इज़हार नहीं करते। क्योंकि मोहब्बत एक दिल की दुनिया है, जिसमें सिर्फ़ किसी ख़ास का ही बसेरा होता है। दिल की दुनिया में जगह सिर्फ़ मोहब्बत के इक़रार और इज़हार के ज़रिए बनाई जाती है। यह ख़ास इजाज़त आशिक़ और माशूक़ एक दूसरे को देते हैं। इन अजनबियों को अगर कोई राह दिखाता है तो वो है इज़हार-ए-मोहब्बत। इसके बाद वो अजनबी नहीं रहते।

वो अचानक आ गई
यूं नज़र के सामने
जैसे निकल आया 
घटा से चांद
चेहरे पे ज़ुल्फ़ें,
बिखरी हुई थीं
दिन में रात हो गई


इस गाने के बोल जितने दिल को छूने वाले हैं, उतने बेहतरीन तरीक़े से इसे राजेश खन्ना और ज़ीनत अमान पर फ़िल्माया भी गया है। फ़िल्मी पर्दे पर अपनी बोल्ड छवि को लेकर चर्चा में रहीं ज़ीनत अमान ने इस गाने में कमाल के फेशियल एक्सप्रेशन दिए हैं। मेरा जितना ध्यान गाना देखते वक़्त राजेश खन्ना पर होता है, उससे कहीं ज़्यादा ज़ीनत अमान के फेशियल एक्सप्रेशन पर। जब राजेश खन्ना ये लाइनें गाते हैं उस वक़्त फ़िल्मांकन देखते ही बनता है.....

जान-ए-मन जान-ए-जिगर
होता मैं शायर अगर
कहता ग़ज़ल तेरी अदाओं पर
मैंने ये कहा तो मुझसे ख़फ़ा वो
जान-ए-हयात हो गई


कभी-कभी ख़याल आता है अगर मोहब्बत में ख़फ़ा होना न होता तो मोहब्बत कैसी होती है? शायद फिर रोमांच न होता। रूठना मनाना न होता। एक दूसरे की छोटी-छोटी बातें नोटिस नहीं की जातीं। शुक्र है ये सिर्फ़ मेरा ख़याल है। वैसे जिस तरह एक-दूसरे की केयर करने से मोहब्बत में यक़ीन पुख़्ता होता है। ठीक उसी तरह ख़फ़ा होने से एक-दूसरी के लिए फ़िक्र और तवज्जो और बढ़ जाती है। इससे दो दिल और क़रीब आ जाते हैं।

ख़ूबसूरत बात ये
चार पल का साथ ये
सारी उमर मुझको रहेगा याद
मैं अकेला था मगर
बन गई वो हमसफ़र
वो मेरे साथ हो गई


इन लाइनों को सुनकर फिर वही याद आता है कि ज़िंदगी एक अंजान सफ़र है और उसमें कई पड़ाव आते हैं। इनमें से एक राह, एक डगर मोहब्बत की भी है, जिसमें अजनबी से मुलाक़ात होती है। जब भी यह गाना सुनता हूं तो लगता है जैसे तल्ख़ और हसीन यादों के दरमियान एक सुकून की दुनिया में ले जाने वाले पुल से गुज़र रहा हूं। 

सुनें ये दिलकश नग़्मा - 

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