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 love can not survive alone, you can described it from this song

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है... प्यार के बाद तन्हाई के गम को बयां करता गाना

शरद मिश्र, नई दिल्‍ली

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प्रेम में दग़ा मिलने से आदमी बिखर जाता है। यह सबको मालूम है। इसलिए लोग प्रेम जैसे संवेदनशील मसले को ज़्यादा गहराई से नहीं लेते हैं। लेकिन इसके बावजूद जिसकी क़िस्मत में प्रेम और विरह लिखा होता है उसे इस रंज का सामना करना ही पड़ता है। प्रेम में धोखा खाने के बाद अकेले में मायूस होकर इस तरह का ग़म अपने दिल में रखे लोगों के लिए यह गीत एक शक्ति का स्रोत हो सकता है। 

सबको पता है जब प्रेम में क़रार के बाद साथी साथ छोड़ जाता है तब हालात ‌कितने नाज़ुक हो जाते हैं। समाज में अगर परिवार की वजह से कोई प्यार का बंधन छोड़ता है तो ऐसे में हम उसे एक मजबूरी कहके दोस्त को दग़ाबाज की संज्ञा देने से हिचकते हैं। लेकिन जब दोस्त सिर्फ़ काम-वासना के फेर में एक सच्चे साथी का साथ छोड़ते हुए प्रेम का बंधन तोड़ता है तब दूसरे साथी को अपने आपको संभालना काफ़ी मु‌श्किल हो जाता है। 

तन्हाई के बियाबान में भटकते ऐसे लोगों के लिए ही 1985 में रिलीज़ ‌फिल्म 'आखिर क्यों' का यह गीत प्रेरणा और साहस का पुंज हो सकता है। गीत बड़ा मनोहारी है। प्रेम और उस पर व्यक्त किए विश्वास की यह भलिभांति व्याख्या करता है। राजेश रोशन के संगीत के तले इस गीत में लता मंगेशकर और अमित कुमार ने अपनी आवाज़ दी है। इंदीवर ने इस गीत को लिखा है। गीत प्रभावशाली अभिनेत्री स्मिता पाटिल और सुपर स्टार राजेश खन्ना के बीच फ़िल्माया गया है। यह गीत मेरे मन के काफ़ी क़रीब है। प्रेम को मामूली सा वादा समझने वालों के लिए यह गीत एक लंबी सीख हो सकता है। गीत के बोल प्रेम के सच के इतने क़रीब है कि वह सीधे मन मस्तिष्क पर गहरा असर डालते हैं।  

गीत का पहला अंतरा-

'दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है
उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है'


प्रेम के बाद तनहाई के गम को बहुत ही गहाराई के साथ व्यक्त करता है। गीत के अनुसार धोखा खाया दूसरा साथी इस बेवफाई को भी उम्र भर का ईनाम समझ बैठता है। अंतरा बताता है कि साथी प्रेम के धोखे को भी एक सौगात मानता है। साथी आगे कहता है कि-     

'तूफ़ां में हमको छोड़ के साहिल पे आ गये
तूफ़ां में हमको छोड़ के साहिल पे आ गये
साहिल पे आ गये
नाख़ुदा का
नाख़ुदा का हमने जिन्हें नाम दिया है
उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है'


अगले अंतरे में भी वह बेवफ़ा साथी को तोहमतें लगाता है। दरअसल प्रेम में साथ छोड़ने पर आदमी ख़ुद से इतना निराश हो जाता है कि उसे कुछ और नहीं सूझता। उसके लिए सारे विकल्प एक तरह से ख़त्म हो जाते हैं। वह चाहकर भी दोबारा जुड़़ने की कोशिश नहीं कर पाता।   

'पहले तो होश छीन लिये ज़ुल्म-ओ-सितम से
ज़ुल्म-ओ-सितम से
दीवानगी का
दीवानगी का फिर हमें इल्ज़ाम दिया है
उम्र भर का ग़म हमें ईनाम दिया है

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बदनामी से बड़ा दाग दुनिया में और कुछ नहीं...

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