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flashback of yarana film song tere jaisa yaar kaha

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

'तेरे जैसा यार कहां...' यक़ीन और हमदर्दी ये महज़ अल्फ़ाज़ नहीं

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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यक़ीन और हमदर्दी ये दो अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि दोस्ती की बुनियाद हैं। दोस्ती की जिस ख़ूबसूरत दुनिया को हम याराना कहते हैं वो यक़ीन और हमदर्दी पर ही टिकी होती है। इसीलिए दोस्ती को अल्फ़ाज़ में पिरोना समुंदर की थाह में जाकर मोती निकालने जितना मुश्किल है। हालांकि, फ़िल्म 'याराना' के इस नग़्मे में मुझे दोस्ती की अमिट यादों के कुछ मोती नज़र आते हैं। यह नग़्मा दोस्ती के सफ़र का एक बेहतरीन गाइड महसूस होता है....

तेरे जैसा यार कहां
कहां ऐसा याराना 
याद करेगी दुनिया 
तेरा मेरा अफ़्साना


किशोर कुमार की पुरकशिश आवाज़ ने इस गाने में चार चांद और लगा दिए हैं। जैसे ही यह गाना शुरू होता है तो लगता है मेरा दोस्त ज़ेहन से निकलकर मेरे सामने मौजूद हो। हालांकि, अक्सर यह गीत तब सुनता हूं जब दोस्त से दूर होता हूं या उसे मिले कई दिन गुज़र चुके होते हैं। जब तक यह गीत बजता है तब तक ज़िंदगी मुझे ख़ुशगवार लगती है। किसी चीज़ का ख़ौफ़ या कमी का एहसास नहीं होता। महसूस होता है कि गीत ख़त्म होते-होते वो मेरे हाल से वाक़िफ हो चुका होगा।

मेरी ज़िंदगी सवारी 
मुझको गले लगाके 
बैठा दिया फ़लक पे 
मुझे ख़ाक से उठाके 

यारा तेरी यारी को 
मैंने तो खुदा माना 
याद करेगी दुनिया 
तेरा मेरा अफ़्साना


परिवार से बाहर एक दोस्ती का ही ऐसा रिश्ता है जिस पर सबसे ज़्यादा ऐतबार होता है। ज़ुबान से कभी दोस्त के सामने शायद इस बात का इज़हार न करें, लेकिन दिल के किसी कोने में पुख़्ता यक़ीन होता है कि अगर दुनिया के खौफ़नाक भंवर में फंसे तो दोस्त कभी मुंह नहीं मोड़ेगा। यह दोस्ती पर यक़ीन ही है जो हमें मज़बूत बनाता है और एहसास कराता है कि दुनिया हमारे ख़िलाफ़ हो जाए या सबका हम पर से भरोसा उठ जाए, मगर दोस्त हमेशा साथ खड़ा रहेगा।

यह रिश्ता है ही ऐसा जो आपको ख़ाक से उठाके फ़लक पे बैठा देता है। आपको यक़ीन होता है कि आपकी दोस्ती के अफ़्साने को दुनिया याद करेगी। एक बात है जो मुझे सालती रहती है। शायद आपने भी महसूस की हो, वो यह कि एक दिन ऐसा भी आता है जब किसी न किसी वजह से दोस्त से दूर जाना पड़ता है। कभी-कभी दोस्ती में नोक-झोंक भी हो जाती है पर इस सबके बावजूद दोस्त के लिए मन से यही निकलता है...

मेरे दिल की यह दुआ है 
कभी दूर तू न जाए 
तेरे बिना हो जीना 
वो दिन कभी न आए


आज ज़माना भले ही तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रहा हो और हम भी शायद उसी रफ़्तार में कहीं शामिल होने की जद्दोजहद में लगे हैं। इस तेज़ रफ़्तार में एक कमी यह है कि सच्ची दोस्ती को भी मुश्किलों से दो-चार होना पड़ रहा है। रब न करे कहीं दोस्ती इस तेज रफ़्तार में गुम हो गई तो यह दुनिया मुर्झाए हुए फूलों का बाग़ लगेगी। ख़ुदा ज़िंदगी में ऐसे दिन कभी न लाए। मेरा दिल बस यही कहता है....

तेरे संग जीना यहां 
तेरे संग मर जाना 
याद करेगी दुनिया 
तेरा मेरा अफ़्साना 


मुझे लगता है कभी-कभी ग़लतफ़हमियां भी दोस्त को अलग कर देती हैं, इसलिए ग़लतफ़हमी की बुनियाद पर दोस्ती के रिश्ते में दरार न आने दें। हो सके तो दोस्त की ग़ैर-हाज़िरी में उसके किसी क़दम के बारे में राय बनाने से पहले उससे बात ज़रूर करें। वरना एक बार दोस्ती में दरार आ गई तो जिंदगी भर पछताने के अलावा कुछ बाक़ी नहीं रहेगा। कहीं ऐसा न हो एक ग़लतफ़हमी की वजह से अफ़्सोस के आंसू पोंछने के लिए ताउम्र ख़ुशियों की बारिश का इंतज़ार करना पड़े।

दोस्ती को अमर कहने वाले इस कर्णप्रिय गीत को यहां सुनिये
 
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