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Unseen dream

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

अनदेखा ख्वाब

Ajju Tiwari

8 कविताएं

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कितनी तेजी से गुजरती है ये रात,
अपारदर्शी शीशे सा ये कठिन रात।
ऊंघती आँखों में तल्खी, हृदय में है बेचैनियाँ,
बस है इक उम्मीद और अधूरी सी
है कई बात।

विलीन है मुझमे वो रूप,
शक्ल और जिस्म के मायने से परे,
पिघली सी है जलती मोम की तरह वो मेरे बाहों के दायरे में
धूमिल सी है शाम, बस है एक स्वप्न और अधूरी सी है रात।

बदलते करवटों में उसकी खुशबू उसके छुवन का एहसास
कानों में गूंजती उसकी हंसी होंठों पे उसका स्पर्श
हौले से मेरे बालों में उसकी उंगलियां,
बातों में उसका विमर्श।
खामोश कालिमा भारी स्वप्नातीत ये रात,
अपूर्ण से न पूरे होने वाले कई ख्वाब।
लौट आओ तुम सपनों से निकल के अजय की जमीं पे हो पूरा अनदेखा ख्वाब ।।

- अजय तिवारी 

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