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a memorable song which is source of courage

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

पुण्यतिथि : किशोर कुमार - रुक जाना नहीं तू कहीं हार के

शरद मिश्र, नई दिल्‍ली

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हिंदी फिल्मों में कुछ गीत ऐसे हैं जो मनोरंजन कम और प्रेरणा ज्यादा देते हैं। इन गीतों के बोल निराशा के पलों में मनुष्य के मन में असीम ऊर्जा का संचार करते हैं। ऐसा ही एक गीत 1974 में रिलीज फिल्म 'इम्तिहान' में विनोद खन्ना पर फिल्माया गया है। यह गीत मेरे मन में ही नहीं बल्कि कई बड़ी हस्तियों के दिलो दिमाग में भी उत्साह और उमंग का संचार करता होगा। गीत की पहली पंक्ति 'रुक जाना नहीं तू कहीं हार के' एक लाइन में ही बहुत कुछ कह जाती है। जिसे प्रेरणा की प्यास होगी, वह इसी एक लाइन के जरिए ही आशा और विश्वास से लबरेज हो जाएगा। इस गीत की पृष्ठभूमि एक तरह से मनुष्‍य के मान-सम्मान पर निर्धारित है। मजरूह सुल्तानपुरी के इस गीत को लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की सदाबहार जोड़ी ने संगीत से सजाया है। किशोर कुमार की आवाज ने इस गीत को एक बेशकीमती एहसास दिया है। 

शुरुआती पंक्तियां कहती हैं-

'रुक जाना नहीं तू कहीं हार के
कांटों पे चलके मिलेंगे साये बहार के
ओ राही, ओ राही...'


यह व्यक्ति को समझाती हैं कि जीवन के य‌थार्थ से जब सामना होगा तब आपको राह में अकेले ही चलना पड़ेगा। वहां आपका साथ कोई नहीं देगा। अकेले कांटों के पथ पर चलने से ही आपको अपना सुकून मिलेगा। एक तरह से बहार के साए मिलेंगे। 

'सूरज देख रुक गया है तेरे आगे झुक गया है
जब कभी ऐसे कोई मस्ताना
निकले है अपनी धुन में दीवाना
शाम सुहानी बन जाते हैं दिन इंतज़ार के
ओ राही, ओ राही...'


गीत में कहा गया है कि दीवानों से अक्सर दुनिया हार जाती है। यहां तक कि एक दीवाना सूरज को झुकाने की हिम्मत रखता है। दीवाना वो होता है जिसमें संकल्प कूट-कूट कर भरा होता है। जब आप एक लक्ष्य को तय कर उस पर मेहनत करने लगते हैं तो सफलता आपको अवश्य मिलती है। गीत यही कहता है कि अपना दीवानापन कभी कम मत होने देना, क्योंकि यही एकमात्र शक्ति का स्रोत है।  आगे पढ़ें

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