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Zindagi sehar ho gayi

मेरे अल्फाज़

जिंदगी शहर हो गईं

vikash sanwal

2 कविताएं

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ज़िन्दगी शहर हो गई

दौड़ती हुई सड़कों पर
इधर से उधर
हजारों की कतारों में
भागती हुई
चली जा रही है
ख़ामख़ा

शहर की टेंशन
बच्चे के जन्म की
बड़े होने की
स्कूल में पढ़ने की
कॉलेज में बढ़ने की
टेंशन

एक नौकरी की
सरकारी की
एक छोकरी की
घरवाली की
टेंशन

मां- बाप की
बीवी की
काम की
आराम की
टेंशन

युवा को नौकरी की
लड़की को छोकरे की
बाप को दहेज की
ससुर को परहेज की
टेंशन

किरायदार को कमरे की
मकान मालिक को पैंसों की
ग्राहक को खरीददारी की
दुकानदार को उधारी की
टेंशन

पंडित को धर्म की
गरीबो को अन्न की
किसान को फसल की
मौत को किसान की
टेंशन

बीमार को दवा की
दीन को दुआ की
गरीब को गरीबी की
अमीर की अमीरी की
टेंशन

चोर को चोरी की
पुलिस को रिश्वत की
मंत्री को कुर्सी की
नकलची को पर्ची की
टेंशन

माली को बगीचे की
व्यापारी को कीड़े की
शराबी को मदिरा की
बच्चे को अंग्रेजी की
टेंशन

मजदूर को काम की
आलसी को आराम की
रुपये को डॉलर की
चांदी को सोने सी
चाँद से मंगल की
हारने और जीतने की
टेंशन


बुढापे में
टेंशन फ़ॉर पेंशन
मरने तक जिंदा रहने की
टेंशन
टेंशन
एंड
टेंशन

- विकास सांवल 


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