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मेरे अल्फाज़

वारे मनई तू विकास कै रोजै नवा विहान देखायव

अतुल अवस्थी

27 कविताएं

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वारे मनई तू विकास कै रोजै नवा विहान देखायव,
सूरज तौ चढ़ि पायेव नाहीं चंदा दौरि दौरि होइ आयव।
होड़ किहेव विज्ञान ज्ञान मा एटम औ परमाणु बनायेव,
धरती पइहां सब प्यासे हैं मंगर पर पानी खोदवायेव।
वारे मनई तू विकास कै -----------------------------

लोहिया और इंदिरा नामे घर घर खूब मकान देवायव,
भरा पेट जो रहै गटहिला तक उनहुक भोजन करवाय।
प्रेमचंदकै हलकू अबहिंव पैरम सोवय रात वितावय,
पूस क्यार जाड़े मा हलकू गुदरी ओढ़े दांत बजावय।
वारे मनई तू विकास कै -----------------------------।

अबहिंउ घर मा हामिद सोवय रोज जरै महतारिक उंगरी,
मेलवा जइस नगीचे आवय मइया घर घर करै मजूरी।
मनरेगा है तबहू पाई पाई का मोहताज बनायेव,
हामिद तौ आंसू ढुरकावै मइयप चिमटा तानि भगायेव।
वारे मनई तू विकास कै -----------------------------।

होरी, धनिया घरे दलिद्दर आजौ जस के तस व्यापे हैं।
खद्दरधारी से विकास कै आस लिहे जीवन नापे हैं,
सुगना की देहीं पर प्यौंदा वाली धोती रोज चिढ़ावय।
गुड़िया फटा दुपट्टा सींवै चार माह से रोज बढ़ावय,
वारे मनई तू विकास कै -----------------------------।

- अतुल अवस्थी *अतुल*

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