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BHULA KE GAM

मेरे अल्फाज़

भुला के ग़म

Utkarsh Pandey

1 कविता

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भुला के ग़म अपने उसके ख़ुशी की दुआ करता हूं,
नम आंखों से अपनी हर सुबह करता हूं

क्या ख़ूब खेला उसने भी मुझसे
की हर रोज़ अपनी ही ज़िंदगी से जुआ करता हूँ ।।

शायद होगी ख़ुश वो किसी ख़ुशक़िस्मत की बांहों में,
हो रही थी घुटन उसे मेरे दिल की पनाहों में

लज़िम है करूं उसके लिए कुछ ऐसा,
की गुलदस्ते बिछ जाए उसके आने वाली राहों में ।।

- उत्कर्ष पांडेय


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