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मेरे अल्फाज़

हमारी पाठक स्वाति गौतम को प्यार लगता है काजल सा...

Swati Sandeep

3 कविताएं

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प्रेम जो सदियों की प्रतीक्षा का
प्रतिफल प्रतीत होता था
बहता हुआ निर्विघ्नं ,निराकार, शांत
किसी नदी सा
बिना पूर्व निर्धारित
जो निश्चित मिलेगी सागर में

अब बन चुका है
आंखों के उस काजल सा
कितना भी बह जाए आँसू बन
हल्की कालिमा
यथासंभव रहेगी तुम्हारी उपस्थिति सी

तुम्हारा प्रेम रखता था
जमा , घटा , समीकरण का ज्ञान
सबका हिसाब किताब लगा
तुमने अलगाव उचित समझा

मन तुम्हें उपस्थित मान ही लेता है
जहां तुम्हें होना चाहिए
आवश्यक से नहीं तुम
मेरे प्रेम को प्रमाणित करने के लिए
अडिग है अब ये
किसी पर्वत, सागर ,पठार, ग्रह सा

मेरी भी इच्छा यही थी
जो तुम्हारा है वो तुम ले जाओ सहेजकर
पर तुमसे जन्मा प्रेम
मुझसे अधिक प्रेम करता था
रत्ती भर अगर लगाव रखता तुमसे
तो यूँ जीवन भर न रह जाता मेरे समीप

- स्वाति_गौतम

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