आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

जयपुर

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

राजस्थान +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   love
love
मेरे अल्फाज़

हमारी पाठक स्वाति गौतम को प्यार लगता है काजल सा...

प्रेम जो सदियों की प्रतीक्षा का
प्रतिफल प्रतीत होता था
बहता हुआ निर्विघ्नं ,निराकार, शांत
किसी नदी सा
बिना पूर्व निर्धारित
जो निश्चित मिलेगी सागर में

अब बन चुका है
आंखों के उस काजल सा
कितना भी बह जाए आँसू बन
हल्की कालिमा
यथासंभव रहेगी तुम्हारी उपस्थिति सी

तुम्हारा प्रेम रखता था
जमा , घटा , समीकरण का ज्ञान
सबका हिसाब किताब लगा
तुमने अलगाव उचित समझा

मन तुम्हें उपस्थित मान ही लेता है
जहां तुम्हें होना चाहिए
आवश्यक से नहीं तुम
मेरे प्रेम को प्रमाणित करने के लिए
अडिग है अब ये
किसी पर्वत, सागर ,पठार, ग्रह सा

मेरी भी इच्छा यही थी
जो तुम्हारा है वो तुम ले जाओ सहेजकर
पर तुमसे जन्मा प्रेम
मुझसे अधिक प्रेम करता था
रत्ती भर अगर लगाव रखता तुमसे
तो यूँ जीवन भर न रह जाता मेरे समीप

- स्वाति_गौतम

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
दीजिए अपनी टिप्पणी
सर्वाधिक पढ़े गए
Gulzar poem on book and relation
इरशाद

हरिशंकर परसाई: जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं?

  • काव्य डेस्क, नई दिल्ली
  • सोमवार, 21 अगस्त 2017
इरशाद

बशीर बद्र: एक चेहरा साथ साथ रहा जो मिला नहीं...

  • काव्य डेस्क-अमर उजाला, नई दिल्ली
  • सोमवार, 21 अगस्त 2017
अन्य
Top
Your Story has been saved!