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मेरे अल्फाज़

बाल दिवस और आज का सच

susheel baghel

103 कविताएं

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मना रहे बाल दिवस,
चाचा नेहरू की यादों में
बच्चों के प्रेम रूप को,
दिखा रहे मैदानों में।।

सजा रहा प्रांगण उठ रही स्टेज,
काम करते उसमे बाल स्वरूप
दो जून की रोटी को बच्चे,
ढो रहे सिर पर लकड़ी की मेज।।

शर्मसार हो रही है धरती भी,
देख अन्याय उन मासूमों पर
भूखे नंगे बच्चों को देखकर,
रो रही होगी कही भारत माँ भी।।

नेताओं को फर्क ना पड़ता,
वो तो मदमस्त रहते भाषण में
बाल दिवस पर चाचा को करते,
नमन और पुष्पों का समर्पण।।

- सुशील अनजान

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