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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

Sohail Ansari

1 कविता

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सलीक़े आंखों के अपने इधर-उधर रखो, 
मुझे जो देखना है तो मेरी नज़र रखो। 

उन्हें यूं देखो की उन से हो जैसे बेगाने,
उन्हें ख़बर भी न हो इस तरह ख़बर रखो। 

अब कोई साया मिलेगा न साया ए दीवार,
सफ़र हो धूप की तो साथ मे सजर रखो। 

वो एक ज़िद थी जो बर्बाद कर गई मुझको, 
किसी भी तरह रखो ख़ुद को मोतबर रखो। 

हमारी पीठ पे ख़ंजर नहीं बहुत दिन से,
अपने दुश्मन की भी इरशाद कुछ ख़बर रखो। 

- सोहेल अंसारी 

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