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Imtihan baaki hai

मेरे अल्फाज़

इम्तिहान बाकी है

Sneha Verma

1 कविता

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माथे की सलवट
आंखों की डबडब
पलकों की थकावट
फिर भी नज़रों में उम्मीद का तेज बाकी है,
ज़िंदगी शायद कुछ और इम्तिहान बाकी है।

बदन में थरथराहट
बाजुओं में कंपकंपाहट
क़दमों की डगमगाहट
फिर भी एक मंज़िल पर पहुंचना बाकी है
ज़िन्दगी शायद कुछ और इम्तिहान बाकी है।

चेहरे की झुर्रियां
सिर पर सफेदियां
होठों की कहानियां
फिर भी हक़ीक़त के किस्से सीखना बाकी है
ज़िन्दगी शायद कुछ और इम्तिहान बाकी है।

वो था दर्पण
किया जीते जी तर्पण
जिस पर पूरा जीवन अर्पण
फिर भी खुद के लिए जीना अभी बाकी है
ज़िन्दगी शायद कुछ और इम्तिहान बाकी है।

- 'स्नेहा वर्मा'

उपरोक्त रचनाकार का दावा है कि ये उनकी स्वरचित कविता है। 
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