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Hey Monalisa !!!

मेरे अल्फाज़

हमारे पाठक संदीप का सवाल 'मोनालिसा 500 सालों से कैसे मुस्कुरा रही हो'

Sandeep Agrawal

1 कविता

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ओ मोनालिसा !

तुम्हारी अमर
असंख्य रहस्यों में लिपटी
मुस्कान के सदके,
जिसने हैरान से ज्यादा
हमेशा परेशान किया है मुझे
कि कैसे कोई
मुस्कराता रह सकता है
पांच सदियों तक निरंतर
बिना कुछ कहे.
तुम्हारी इस शाश्वत चुप्पी को देख
कभी-कभी तो लगता है
कि तुम्हारा नाम मौनालिसा होता
तो ज्यादा बेहतर होता.

क्या मुमकिन है कि
इन पांच सौ सालों में
तुमने वो कुछ भी न देखा हो
जो झेला है लगातार
शेष संसार ने ?
दर्जनों लड़ाईयां,
बीसियों महामारियां,
सैंकड़ों सुनामियां
और तमाम कुदरत के
और इंसानी कहर.
सच-सच बताना
क्या कभी तुम्हारी आंख से
नहीं गिरा एक भी आंसू?
या यूं ही मुस्कराती रही हो तुम
अपनी संगदिली के साथ?

तुम्हारी आंखों ने देखे होंगे
यकीनन हजार मौसम भी
इन पांच सदियों में...
पांच सौ पाले,
पांच सौ पतझड़,
पांच सौ बहारें,
गर्मी, बारिशें और ठिठुरन...
इतने बदलावों के बीच
और इनके बावजूद
तुम्हारी स्मित रेखा
कभी जरा सी भी
टस से मस हुई हो,
ऐसा कोई मामला
अभी तक तो प्रकाश में नहीं आया

तुम्हारी इस सदाबहार
कालजयी मुस्कान के
सम्मोहन से मुक्त होकर
जब मैंने पाया अवसर
तुम्हारी आंखों की
गहराई में उतरकर
तुम्हारे हृदय की
थाह लेने का
तब मैंने जाना
राज तुम्हारे इस
चिर मौनव्रत का.
सच ही तो है
जिसकी आंखें
इतना स्पष्ट बोलती हों
उसके लबों को
जरा सी भी जुंबिश की
जरूरत ही क्या है...

बेशक पूरी कायनात में
चर्चे हों तुम्हारी मुस्कान के,
लेकिन इससे कहीं ज्यादा
दिलचस्प हैं तुम्हारी आंखें.
कहते हैं कि इनकी पृष्ठभूमि में
कभी दिखती थी
उदासी की एक भरी-पूरी झील
जिस पर जमती गई
वक्त की गर्द
बीतते सालों के साथ-साथ
परत-दर-परत...
सब की तरह
मैं भी जीता रहा हूं
सदा इस डर के साथ
कि कहीं इस गर्द को
पोंछने की जद्दोजहद में
मिट न जाए
तुम्हारे होंठों की मुस्कान भी

मेरी मोनालिसा !
न जाने वो कोई ख्वाब था
या फिर जादुई वक्फा कोई
कि एक दिन
मैंने देखा
अपनी उनींदी आखें
मल-मल कर
दीवार पर टंगी
तुम्हारी तस्वीर की जगह
सिर्फ एक कोरा कैनवास था
और तुम मेरे पास बैठीं
ले रहीं थी कॉफी की चुस्कियां
मेरे ही प्याले से...
उस दिन जितनी मीठी काफी
न पहले लगी थी कभी
न उसके बाद ही.

ये मेरा वहम था
या वाकई हकीकत की बात कोई
कि मेरे साथ
जब भी होती थीं तुम
मुझे तुम्हारी आंखें
मुस्कराती दिखती थीं
और लब जुंबिशें लेते हुए,
गोया थक चुके हों
सदियों से एक जबरिया ओढ़ी
मुस्कान का बोझ उठाए-उठाए.
तुम्हारे बार-बार कहने से
मुझे भी यकीं सा होने लगा
कि तुम्हारी यह मुस्कान
मेरे लिए है
और मेरी वजह से है
ठीक वैसे ही जैसे
तुम बन गई थीं
मेरी खुशी की वजह

तुम्हारी मुस्कराती आंखों में
जब भी देखा
मैंने अक्स अपना
पल के हजारवें हिस्से में
एक नमी सी आकर
धुंधला देती थी उसे
जैसे वक्त की गर्द को चीर
आंखों में पसरी
उदासी की झील
उमड़ आई हो
किनारों को छोड़कर...
पर तुमने कभी
जानने ही नहीं दी
मुझे अपनी उदासी की वजह
जैसे छिपाकर रखे थे
अपनी मुस्कान के राज
कई सदियों तक

कैनवास से बाहर
जब हकीकत बन गई थीं तुम
तो एक भरी-पूरी दुनिया
तुम्हारे सामने थी
जानने, महसूस करने
और जीने के लिए...
नित नए लोग,
नित नए प्रयोग
फैलता गया तुम्हारे
प्रशंसकों का दायरा
और मैं सिमटता गया निरंतर
परिधि की ओर
अपनी अव्यक्त व्यथाओं
और कुछ जाहिरी शिकायतों के साथ.
तुम्हारी बदलती प्राथमिकताओं में
मेरे लिए कोई जगह न थी
अब मुझे देने के लिए
तुम्हारे पास
वक्त की जगह बहाने थे
और जवाब की जगह
वही चिर-परिचित खामोशी 

- संदीप अग्रवाल 

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