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salini priya sinha poem zindagi

मेरे अल्फाज़

हमारी पाठक शालिनी प्रिया सिन्हा की कविता 'जिंदगी'

Shalini Priya Sinha

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ज़िंदगी 

ज़िंदगी पल पल फिसल रही है
जैसे कि रेत मुट्ठी से निकल रही है
हर पल गिले शिकवे के सिलसिले हैं
दोस्तों और रिश्तों के ख़त खुले हैं

हंसना मिलना बोलना सबका जुदा जुदा है
सबकी फितरत का अलग सिलसिला है
चार दिन की ज़िंदगी को जीने का 
ये कैसा फ़लसफ़ा है

कोई किसी से ख़फा है तो कोई किसी से जुदा है
कोई किसी को क्यूं महसूस नहीं करता
खोखली हंसी और झूठी शान का 
ये भी कैसा नशा है 

- शालिनी प्रिया सिन्हा 

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