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labon ne geet chaht ka tarrnum me sunaya h

मेरे अल्फाज़

लबों ने गीत चाहत का तरन्नुम में सुनाया है...

Rohit Krishna

3 कविताएं

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तुम्हें हमने सनम जब से निगाहों में छुपाया है
लबों ने गीत चाहत का तरन्नुम में सुनाया है

तुम्हें पाकर जहां पाया कोई न और चाहत है
जो लब तक आ गयी सबके वही अपनी मोहब्बत है

मेरा कद था बहुत छोटा उसे अम्बर बनाया है
तुम्हें हमने सनम जब से निगाहों में छुपाया है

लबों ने गीत चाहत का तरन्नुम में सुनाया है
धरा सी तुम रहीं हर पल न हरगिज़ साथ छोड़ा है

मेरी खातिर ज़माने भर से नाता तुमने तोड़ा है
मेरे गुस्से, मेरी जिद ने तुम्हें अक्सर रुलाया है

तुम्हें हमने सनम जब से निगाहों में छुपाया है
लबों ने गीत चाहत का तरन्नुम में सुनाया है
           
© रोहित कृष्ण नंदन

उपरोक्त रचनाकार का दावा है कि ये उनकी स्वरचित कविता है। 
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