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Do Gaj Jamin

मेरे अल्फाज़

दो गज़ ज़मीं

Ratna Pandey

16 कविताएं

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प्रलय के बाद दो इंसान प्रभु ने छोड़ दिये,
एक मनु और एक इला वो दोनों साथ में हो लिये ।
बढ़ रहा था परिवार धरा पर, वो बहुत खुश थे,

खुशी के इस आलम में, वो समझ ही ना पाये,
कब उनके बच्चे हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई में बंट गये।
वह देखते ही रह गये पर कुछ न कर सके ।

देखते ही देखते ज़माना बदल गया,
अब कहीं रावण तो कहीं दुर्योधन की सेना है,
भाई भाई ने यहाँ आपस में एक दूसरे को घेरा है।

कहीं आतंकियों का जमघट, तो कहीं डाकू लुटेरे हैं,
इन सबने मिलकर दुनिया को घेरा है।
नहीं डरते हैं यह भगवान से इंसान से क्या डरेंगे ।

लगा दो कितने भी पहरे पर पाप यह ज़रूर करेंगे,
यहाँ इंसान समझ नहीं पा रहा है। 
दो गज़ ज़मीं के लिये ख़ून बहा रहा है। 

उसे शायद यह एहसास ही नहीं है,
कि जिस ज़मीं के लिये वो लड़ रहा है। 
एक दिन उसी में समा जायेगा। 

ज़मीं तो ज़मीं ही रहेगी,
इंसान ख़ुद मिट्टी बन जायेगा।
ना कुछ लाया था ना कुछ ले जायेगा,

दो गज़ ज़मीं के नीचे दफ़न हो जायेगा ।
दो गज़ ज़मीं के नीचे दफ़न हो जायेगा ।

-रत्ना पांडे



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