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मेरे अल्फाज़

वो तूफ़ां में मुकद्दर ढूंढ़ लेगा

ranjeet bhattacharya

1 कविता

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अभी है दर बदर घर ढूंढ़ लेगा
वो दरिया है समंदर ढूंढ़ लेगा

उसे कश्ती चलाने दो नहीं तो
वो तूफ़ां में मुकद्दर ढूंढ़ लेगा

तलाशी ख़त्म होगी जिस्म की तब
वो जब इक रूह का दर ढूंढ़ लेगा

गिरा दे पेड़ तू फल खुद ही वरना
पके आमों को पत्थर ढूंढ़ लेगा

उसे शीशे के घर में रहना है तो
वो अपने आप बक़्तर ढूंढ़ लेगा

समंदर में गुहर इक छिपके सोचे
मुझे भी कोई आकर ढूंढ़ लेगा

- रंजीत भट्टाचार्य
  मो.7587347882


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