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Jindagi Ruh Ki tishnagi kab talak

मेरे अल्फाज़

ज़िन्दगी रूह की तिश्नगी कब तलक

Ramesh Singh

23 कविताएं

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ज़िन्दगी रूह की तिश्नगी कब तलक
चाँदनी कब तलक रोशनी कब तलक।।

नींद आई नहीं रात बाकी रही
तीरगी कब तलक शायरी कब तलक।।

ख्वाहिशों का सफ़र भी अधूरा रहा
ख़्वाब मौजूद है बेदिली कब तलक।।

पैरहन ये मेरा कब का जाली हुआ
चीथड़ों पे चले इश्तिरी कब तलक।।

कैद-ए-जाँ से पड़ा ही निकलना हमें
रू-ब-रू मौत से काहिली कब तलक।।

देखिए बारहा वक़्त जो भी मिले
फ़िर मिले न मिले बानगी कब तलक।।

कौन जाने सुख़न कौन है आखिरी
महफ़िलों में रहे हाजिरी कब तलक।।

वक़्त हालात ने दर ब दर कर दिया
बेक़सी कब तलक बेबसी कब तलक।।

चाहतों को दफ़न कर कब्र से चले
उसकी मर्ज़ी के आगें चली कब तलक।।

- रमेश


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