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मेरे अल्फाज़

हवा कहां चली मगर हमें लगा अभी अभी

Ramesh Singh

23 कविताएं

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हवा कहां चली मगर हमें लगा अभी अभी,
कही किसी ने हाथ से हमें छुआ अभी अभी।

उतर चुका खुमार वो तुम्हें कहें कि जिंदगी,
भुला चुके दयार वो पता चला अभी अभी।

जले हुए हमें यहां कई बरस है हो चुके,
दिखा नहीं तुम्हें कहीं धुँआ उठा अभी अभी।

चलो चले कि चाँद तक सफर करें अगर कहो,
सवाल ही अजीब था मिटा दिया अभी अभी।

करीब से न देखिए हसीन शाम है नहीं,
बुझे हुए चिराग़ थे जला लिया अभी अभी।

कसूरवार हम नहीं सजा मगर क़बूल थी,
किसी जहीन शख़्स ने वफ़ा किया अभी अभी।

हयात की तलब नहीं न मौत का पयाम है,
अजीब से ख्याल को नहीं लिखा अभी अभी।

- रमेश


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