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मेरे अल्फाज़

ग़रीब का हाल

Ramandeep Singh

5 कविताएं

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ग़रीब का भी क्या हाल है,
कोई नहीं सोचता बेचारा कितना लाचार है। 

मजबूरी में बेचारा जी जान से मज़दूरी करता है,
चार पैसे कमा के लाएगा, भूखे बीवी-बच्चों
को खाना खिलाएगा। 

ये सोचके रोज़ सुबह घर से निकलता है,
दिन भर धूप में बेचारा सड़ता है। 

भूख और प्यास से भी लड़ता है,
ख़ुद की परवाह कहां बेचारा करता है। 

परवाह तो होती है इससे अपने परिवार वालों की,
इसलिए तो जी जान से मेहनत करता है। 

ठेकेदार के ताने तक चुप चाप सुनता है,
बस इस आस में कि दिन भर की मज़दूरी के

बाद चार पैसे हाथ आएंगे
और बीवी-बच्चों के काम वो पैसे आएंगे। 

जब दिन ख़त्म होता हैं और ठेकेदार के पास
जब अपनी मेहनत के पैसे मांगने जता है तो
ठेकेदार सीना तान के उसके सामने खड़ा हो जाता है,

उस बेचारे की मेहनत के आधे से ज़्यादा
पैसा तो वो ख़ुद ही खा जता है। 

और कुछ ही पैसे उसके हाथ में थमाता है,
बेचारा सोचता हैं कि सुना दूँ इस ठेकेदार को

और छोड़ दूं इस जल्लाद की मज़दूरी अब,
पर उसको आंखों के सामने उसके मासूम

भूख से तड़पते बीवी-बच्चों का चेहरा नज़र
आता हैं और वो ना चाहते हुए भी चुप हो जता है।

- रमनदीप सिंह सहगल


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